एक प्यास
अपनों के इस भीड़ में भी
हरपल ख़ुद को तन्हा पाता हूँ
रहकर समंदर की गोद में
आज ख़ुद को प्यासा पाता हूँ
नूर भरी बहार में भी
दिले गुल को आज बेजार पाता हूँ
रफीकों से भरे इस शहर में
ख़ुद को बेसहारा पाता हूँ
कतरों के सैलाब में भी
अपनी नफ़स को थका पाता हूँ
बुलंदियों की इस दौड़ में
आज ख़ुद को खड़ा पाता हूँ
सर्द बाद -ऐ-नसीम में भी
इस दिल को जला पाता हूँ
गुलेरंग में भरी महफ़िल में भी
बदन को बेरंग पाता हूँ
रिश्तों की इस मयखाने में भी
लवों को जला पाता हूँ
नशेमन के बाज़ार में आज
सर को बे-आसरा पाता हूँ
रौशनी के इस तूफ़ान में भी
आँखों को स्याह पाता हूँ
नूर बरसाते सितारों में
शिहाव को आज बेनूर पाता हूँ
मार्च २००७ में रचित
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