रविवार, 25 जनवरी 2009

एक प्यास

एक प्यास
अपनों के इस भीड़ में भी 
हरपल ख़ुद को तन्हा पाता हूँ
रहकर समंदर की गोद में 
आज ख़ुद को प्यासा पाता हूँ 

नूर भरी बहार में भी 
दिले गुल को आज बेजार पाता हूँ 
रफीकों से भरे इस शहर में 
ख़ुद को बेसहारा पाता हूँ 

कतरों के सैलाब में भी 
अपनी नफ़स को थका पाता हूँ 
बुलंदियों की इस दौड़ में 
आज ख़ुद को खड़ा पाता हूँ 

सर्द बाद -ऐ-नसीम में भी 
इस दिल को जला पाता हूँ
गुलेरंग में भरी महफ़िल में भी 
बदन को बेरंग पाता हूँ 

रिश्तों की इस मयखाने में भी 
लवों को जला पाता हूँ 
नशेमन के बाज़ार में आज 
सर को बे-आसरा पाता हूँ 

रौशनी के इस तूफ़ान में भी 
आँखों को स्याह पाता हूँ 
नूर बरसाते सितारों में 
शिहाव को आज बेनूर पाता हूँ
मार्च २००७ में रचित

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