शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

मेरे महबूब

मेरे महबूब में क्या बात है, कलाम में बताई नहीं जाती
सनम की जितनी तारीफ करूँ, लवों में समायी नहीं जाती

आफ़ताब में महताब में उनका ही सब  नूर-ऐ-जमाल है
उनमे कौन सा रंग है, रंगीन कमान में समायी नहीं जाती

शहर में सहरा में उनका ही सब  खाक-ऐ-महाल है
उनके कितने चेहरे हैं, दुनिया-ऐ-शबीह में उतारी नहीं जाती

लहर में बहर में उनका ही सब ग़ज़ल-ऐ-महफ़िल है
उनमे कितनी तरन्नुम है, मकामात में समायी नहीं जाती

ज़हरा में शज़रा में उनका ही सब  रूह-ऐ- कमाल है
उनमे कितनी अबीर है, कभी नफ़स में छुपाई नहीं जाती

मंजर में पसमंजर में उनका ही सब नज़र-ऐ-कामिल है
उनमे कितने इल्म है, कभी तफ्सील से सुनाई नहीं जाती

कलाम-Words, आफ़ताब- Sun, महताब- Moon, नूर-ऐ-जमाल- Beautiful light
रंगीन कमान- Rainbow, सहरा-Desert, शबीह-Portrait, बहर- River, तरन्नुम- Rythem
मकामात- Music scale, ज़हरा- Flower, शज़रा- Trees, कमाल-Perfection,
अबीर- Fragnance, मंजर-Perspective, पसमंजर- Background, कामिल-Perfection
इल्म-Knowledge तफ्सील-Detail

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