चेहरे पर लकीर आ भी जाये फ़ासिला कम हो
गुरब्बत के दिन
चाहे आये दिलों में गिला कम हो
सफर में है हम संग की तरह इस भरी दुनिया में
इश्क असर हो
गर शिकवों का दाखिला कम हो
ज़लज़ला भी आये तो आने दो दिलों की बस्ती में
रिस्ताए इमारत
बनेगी गर बुनियाद हिला कम हो
परवाना शमा की तरह जिए जाओ मदमस्ती में
अब रकीब हर
नफरत का ये सिलसिला कम हो
सहरा में शजर की परवरिश के लिए हम वतन
दोस्त गुजिश्ता रंजिशें
जो हो अब सिला कम हो
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