शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2018

हयात


बसंती बयार में  इतराते गुलों की हस्ती तमाम होती है  
मौसमें बहार ही नहीं पतझर के दिन भी सतरंगी होती हैं

शरारे शमा  में मचलते बहकते परवाने को कहाँ मालूम
रूह-जिस्म का बाबस्ता कितना इक दिन ये फ़ना होती है

हाथ से फिसलते गिरते रेत की तरह उम्र को कहाँ मालूम
लिबास बदलने में गुज़री इक दिन हयात भी अजल होती है

वक़्त के मारे कराहते बिलखते दर्देदिल को कहाँ मालूम
खिजां  व बहार की तरह हर गम की इक इंतिहा होती है

खिजां में  शाख से  टूटते बिखरते पत्तिओं को कहाँ मालूम
कायनात में कब तक शिहाब  रात की इक सहर होती है



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