शहर से देहात-ऐ-तलक ये जीवन थम सा गया हैआशियाँ में हयात बर्फ की तरह ज़म सा गया है
बस्ती में इंसानों को मयसर नहीं आब-ओ-दाना
मासूमों की बेबसी देखकर आंखे नम सा गया हैं
टूट गयी सब हसरतें व छीन गयी हाथों से निवाले
#कोरोना के इस दौड़ में पमालों का दम सा गया है
वीरां हुए सब रास्तें और मंज़िलें हुयी अब ओझल
जुदा ऐसे हुए सब लगता है कोई हम सा गया है
शिफा की उम्मीद में अहाते में कैद व सहमे हम
गुजर रही है ऐ पल जैसे महीनों में रम सा गया है
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