रविवार, 21 मार्च 2021

लाज़बाब

पढ़ के देखो सनम खुली क़िताब हूँ 
मैं बेहद बेमिसाल और बेहसाब हूँ

चश्में हटाकर देखिए मेरी रंगत को
मैं लालासाँ लबरेज़ व लाजवाब हूँ

तनाफुस से भी खुश्बू भर जाएगी  
मैं गुल गुलबार और गुले- ख्वाब हूँ

घर कर जाऊंगा तेरी अल्फाजों में
मैं जूनूनी जांबाज़ जमीनीजनाब हूँ

फज़ाओं में शबनम के ताजग़ी में
मैं शबेसहर में शुमार शामे शराब हूँ




शुक्रवार, 19 मार्च 2021

नादानियां

नादान हूँ समन्दर में तो रहा लहर नहीं देखा
पीता रहा इस तरह उम्र भर खुमर नहीं देखा

पसीने से लथपथ होकर पहुँचा था विस्तर पे
बिताया रात फलक के नीचे क़मर नहीं देखा

रोजमर्रा में शिकस्त कैसे हो नगीनों पे नज़र 
दिन कटें सदफ़ के बाज़ार में गुहर नहीं देखा

तेरे इश्के जूनूनीयत का आग यूँ लगा दिल में
आतिस के दरम्यान रहते हुए शरर नहीं देखा

तेरी नज़रों में खोया कितने नज़रों का नज़र
नज़रों में बसा उन नज़रों का हुनर नहीं देखा

मसरूफ थे मंजिल के याद में डगर नहीं देखा
गुजरा अपना कारवां पहर दो पहर नहीं देखा

गुरुवार, 18 मार्च 2021

प्यम्बर

डूबा दूँ दरिया के प्यास को समंदर बनना चाहता हूँ

सोख लूँ नमी हर आँखों से कलंदर बनना चाहता हूँ

 

दोस्तों से ही दिलदारी करते हुए पाया हूँ जमाने को 

जीत लूँ दिल दुश्मनों का सिकन्दर बनना चाहता हूं

 

मिलें सबोंको अपने दिल का साथी इस अंजुमन में 

आबाद कर दूं नशेमन को स्वयंवर बनना चाहता हूँ

 

हर शख्स है परेशान कभी जलजलों कभी सैलाब में 

मिटा दूं सालभर की रंजिशे नवम्बर बनना चाहता हूँ 

 

पयाम सुनकर बेबसों के रूख पर जाये हलचल

झूला दूं लबों पर मुस्कुराहट प्यम्बर बनना चाहता हूँ