डूबा दूँ दरिया के प्यास को समंदर बनना चाहता हूँ
सोख लूँ नमी हर आँखों से कलंदर बनना चाहता हूँ
दोस्तों से ही दिलदारी करते हुए पाया हूँ जमाने को
जीत लूँ दिल दुश्मनों का सिकन्दर बनना चाहता हूं
मिलें सबोंको अपने दिल का साथी इस अंजुमन में
आबाद कर दूं नशेमन को स्वयंवर बनना चाहता हूँ
हर शख्स है परेशान कभी जलजलों कभी सैलाब में
मिटा दूं सालभर की रंजिशे नवम्बर बनना चाहता हूँ
पयाम सुनकर बेबसों के रूख पर आ जाये हलचल
झूला दूं लबों पर मुस्कुराहट प्यम्बर बनना चाहता हूँ
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