बुधवार, 21 जुलाई 2021

जान-निसार

ये मिल्लत तुझे हम बेपनाह प्यार करते हैं 
नेकी के राह में हम जान निसार करते है 

किसी के आँखों में कभी न आ जाये नमी
जान का क़तरा क़तरा हम फुवार करते हैं 

तेरा दामन और आसियाना सलामत रहें 
धन दौलत को सदके से  बेज़ार करते  हैं

तुझ से जुदा हमारे जीस्त का वजूद कहाँ 
ये वतन तुझे हम अश्क बेशुमार करते हैं
 
कोई मासूम कोई मजलूम भूखा ना  रहें 
मालिक से यही  हर बार गुहार करते हैं 

संगदिली व तंगदिली से हमें निजात मिले 
आज दिल से इक ऐसा ही करार करते हैं 

ईद सबके घरों में यूँ ही मनाई जाती रहें  
चलो इसके लिए उपाय हज़ार करते हैं 

शनिवार, 17 जुलाई 2021

अल्फाज़

शायद मैं चन्द अल्फाज़ हूँ मेरा  कोई मकां नहीं
फैल जाता हूँ स्याही की तरह जिसकी इंतहां नहीं

कितने नायाब हरफ़ सजा रखें अपनी गुलशन में
कैसे बताऊं इसे अपने रूप का कोई गुमां नहीं

धीरे धीरे मेरा वजूद घुल जाता हैं इन्हीं फजाओं में
मेरे सिम्त की कोई सरहद नहीं कोई निशान नहीं

किसके जानिब अपनी अल्फ़ाज़ों का रूख करूँ
जिसकी मुक़्क़मल जमीन नहीं कोई आसमां नहीं 

मरासिम है हिंदवी से कभी रेख़्ता से कभी उर्दू से
इन चंद अशआर के सीवा मेरी कोई ज़ुबान नहीं 
  
भटकता हूँ कभी गंगा कभी सिंधु के वादिओं में 
बेपनाह तिश्नगी का अनवरत सफर आसान नहीं