गुरुवार, 2 सितंबर 2021

शहरे दिल्ली

मिरी तो कोई औकात नहीं है शहरे दिल्ली में 
ग़ालिब उन तंग कूचे से कोई निकलती तो है।
 
ख़ुसरो मीर दाग मोमिन हर कोई रूहजादा हुए 
उनके अल्फ़ाज़ों की सिसकियाँ निकलती तो हैं।

कुछ हमसाया हुए राह में कुछ वफ़ा न कर पाए
लेकिन उसके यादों की कशिश निकलती तो है। 

हज़ारों सालों में मिट न सकी मिरी फितरत यारों
नादिर के क़त्लेआम की ख़बर निकलती तो हैं।

बनता रहा है हमारा ये नशेमन टूटकर सात बार
चुनांचे हमारे माती से कुछ ख़ुशबू निकलती तो है।

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