मिरी तो कोई औकात नहीं है शहरे दिल्ली में
ग़ालिब उन तंग कूचे से कोई निकलती तो है।
ख़ुसरो मीर दाग मोमिन हर कोई रूहजादा हुए
उनके अल्फ़ाज़ों की सिसकियाँ निकलती तो हैं।
ग़ालिब उन तंग कूचे से कोई निकलती तो है।
ख़ुसरो मीर दाग मोमिन हर कोई रूहजादा हुए
उनके अल्फ़ाज़ों की सिसकियाँ निकलती तो हैं।
कुछ हमसाया हुए राह में कुछ वफ़ा न कर पाए
लेकिन उसके यादों की कशिश निकलती तो है।
हज़ारों सालों में मिट न सकी मिरी फितरत यारों
नादिर के क़त्लेआम की ख़बर निकलती तो हैं।
बनता रहा है हमारा ये नशेमन टूटकर सात बार
चुनांचे हमारे माती से कुछ ख़ुशबू निकलती तो है।
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