बुधवार, 13 अक्टूबर 2021

अनवरत सफर

पल में ही पल जीने का पहर है 
जीवन हरपल अनवरत सफर है

सर्द मौसम में पत्ते तो बिखरते है
बहार की ताक में खड़ा शज़र है

मकाम बदल गया मंजिल नहीं
आँखों मे जज्ब कल का डगर है

उस समंदर में कुछ है हलचल
प्रतिद्वंदी मित्र और वही समर है

होठों में है एक ही मन्त्र प्रतिक्षण
तीन रंगों में लिपता सा ज़िगर है


 

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