शनिवार, 27 नवंबर 2021

तिजारत

कितनों ने अपने को ढ़लते हुए देखा है।
वेबशी में सपनों को मरते हुए देखा है।

राहों से श्मशाने तलक तक के मंजर में
निगाहों के नमी को सूखते हुए देखा है

जीने की चाह में लूट रहा था सरमाया
आबोहवा का तिजारत होते हुए देखा है

बाजों व शाहीन को थी मौके की तलाश 
कुछ को आवाम को नोचते हुये देखा है

दवा दारू की खोज में गुजरते दिन रात
अव्वल मालदारों को बिकते हुए देखा है

खुदगर्जी के उस दौर में टूटा था इंसान
इंसानियत को तार तार होते हुए देखा है 

सुख ही गए थे कितने आँखों  से पानी 
मासूमों  की चिता सजते हुए देखा है 

दहशत के गिरफ्त में था देहात शहर  
कोरोना से घरों को बेजार हुए देखा है 

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