शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

रिश्तें

जो हैं नहीं उसे देखने की हसरत नहीं
जागीर कभी था इसका गफ़लत नहीं

शबीह दिल में बसा कर रखा है दोस्त
चुनाँचे बार बार देखने की फुरसत नहीं

दरम्यां भले हजार कोस की बन गयी है
अब ये ना कहना कि मुझे उल्फ़त नहीं

रिश्तों के जंजीर की तासीर ऐसी होती 
रोज रोज आजमाने की खसलत नहीं
  
होने का अहसास ही बहुत है सदीक 
गौर देखिये ये दुनिया क्या जन्नत नहीं 

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