शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

बेताबी

बेसब्र हूँ फिर से हसीन महताब तुम्हें चूमने को
बेताब हूँ तेरी जमीन पे दो चार कदम घूमने को  

हौसला भी साथ दुआ भी है हिन्द के अव्वाम का 
कारवां तैयार है सफर लाख मीलों की करने को 

राहें भटक गयी थी लेकिन इरादे है बुलंद अपनी 
चार साल से बेचैन हूँ दिलबर फासले मिटाने को  

मक़ाम पार करता हुआ पहुंचा हूँ तेरी जुस्तजू में
दर दस्तक दे रहा हूं क़मर तुझसे रूबरू होने को

हो गयी खतम हिज़्र की रातें  इंतज़ार के लम्हें 
बेकरार हूँ अब आग़ोश में दो हफ़्ता बिताने को

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