दीनदारी को समझना भी एक जंग है
जुदा राहें कोई साहिब कोई मलंग है
जुदा राहें कोई साहिब कोई मलंग है
ज़र्रे ज़र्रे में भी नज़र आ जाता है खुदा
देखने का सबका अपना अपना ढंग है
जौहरी के लिए बेशकीमती जवाहिर
तो किसी बहशी के लिये सिर्फ संग है
जिसने जाना वह कभी जान न पाया
ईल्म नहीं लेकिन सोच कितनी तंग है
तरन्नुम में साँसे शम्स भी क़मर भी
अजीब करामात देखकर सब दंग है
जो पिया वह प्यासा न पिया वह भी
कुछ होते बेहोश न जाने कैसा भंग है
नज़र आता नहीं सुर्ख़, सब्ज़, जर्द
जेहन में चढ़ा कौन आसमानी रंग है
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