रविवार, 9 जुलाई 2023

आसमानी रंग

दीनदारी को समझना भी एक जंग है
जुदा राहें कोई साहिब कोई मलंग है

ज़र्रे ज़र्रे में भी नज़र आ जाता है खुदा
देखने का सबका अपना अपना ढंग है

जौहरी के लिए बेशकीमती जवाहिर
तो किसी बहशी के लिये सिर्फ संग है

जिसने जाना वह कभी जान न पाया
ईल्म नहीं लेकिन सोच कितनी तंग है

तरन्नुम में साँसे शम्स भी क़मर भी 
अजीब करामात देखकर सब दंग है

जो पिया वह प्यासा न पिया वह भी
कुछ होते बेहोश न जाने कैसा भंग है

नज़र आता नहीं  सुर्ख़, सब्ज़, जर्द 
जेहन में चढ़ा कौन आसमानी रंग है

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें