रविवार, 26 अक्टूबर 2025

सहर

स्याह शब के सीने में सहर दमकती तो है।
मशरिक़ में रोज आफताब निकलती तो हैं।

नरगिसें अपनी सूरत पे ना इतना इतराये
फ़कत सूखा ही सही मोगरा महकती तो है।

चल रहा है यूं ही बिखरते रिश्तों का कारवां
आंखें खामोश ही सही सांसें लरज़ती तो है

बहुत नमी है दोस्त रिश्तों के आवो हवा में 
सहाब भले बेशर्म हो निगाहें बरसती तो है

बन रहा आशियां जिसे उजाड़े सय्यादों ने 
गुलशन में फिर से बुलबुल चहकती तो है

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