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रविवार, 27 जुलाई 2014

मिल्लत व उख़ूवत

आलम-ऐ-इंसान के दरम्यां मिल्लत व उख़ूवत बनी रहेंI
आकबत की खबर रब जाने दुनिया-ऐ- हकीकत बनी रहेंI

ईमान का तकाज़ा है सबों की खुशुशी शक्शियत बनी रहेंI
दीन-ऐ-नाम चाहे हम जो भीं दें उनकी अहलियत बनी रहेंI

रंग खुशबू जमीं फलक से गुलज़ार ये कायनात बनी रहेंI

अर्शोफर्श में अख्लाख़े आईन हो उनकी करामात बनी रहेंI

सदियों से ऐ पैगाम सरेआम है इंसानी फितरत बनी रहेंI
मंजिल- ऐ- जानिब मुख्तलिफ है उनकी रहमत बनी रहें I

दिल शफ़ाफ़ हो आइने की तरफ कौमी ज़ज़्बात बनी रहेंI
अज़ल पुरनूर हो शिहाब का उनकी अज़ालियत बनी रहेंI



[दरम्यां- between, उख़ूवत- Brotherhood, खुशुशी-specific
आकबत- Ressurection, फितरत- Nature, तकाज़ा-Reminder
कायनात- Universe अर्शोफर्श- Heaven and earth
करामात-Magic, आईन-Code, अख़लाख-moral, शिहाब-Shooting star
मुख्तलिफ- Distinct, अहलियत- Worthiness, अज़ालियत- immortal]