गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

उम्मीद


चेहरे पर लकीर आ भी जाये  फ़ासिला कम हो
गुरब्बत के दिन चाहे आये दिलों में गिला कम हो 

सफर में है हम संग की तरह इस भरी दुनिया में 
इश्क असर हो गर शिकवों का दाखिला कम हो  

ज़लज़ला भी आये तो आने दो दिलों की बस्ती में  
रिस्ताए इमारत बनेगी गर बुनियाद हिला कम हो  

परवाना शमा की तरह जिए जाओ मदमस्ती  में 
अब रकीब हर नफरत का ये सिलसिला कम हो

सहरा में शजर की परवरिश के लिए हम वतन 
दोस्त गुजिश्ता रंजिशें जो हो अब सिला कम हो 

वक़्त की उम्र


वक़्त की उम्र कितनी कोई हमें हसाब बता दे
कल आज और कल के राज को अजाब बता दे

सफर में मौत कब होती ये कोई जवाब बता दे
पलों में फ़ना जिंदगी को  कोई बेहसाब बता दे

आने जाने की आँख मिचौनी को सबाब बता दे
जीने मरने  के खेल को कोई लाजबाव बता दे

सब्ज उगते रहेंगे कोई  रंगो का पड़ाव बता दे
महफ़िल और  कारवां का कोई ठहराब बता दे

लम्हों में सालों जीने की  कोई ख्वाब बता दे
क़तरा-समंदर में  भेद नहीं इसे शहाब बता दे  

बुधवार, 10 जून 2015

तरन्नुम

तरन्नुम ही जिंदगी की अव्वल शर्त होती है 
ये वो तार है जिसे टूटने पर मौत होती है

तर्रनुम का अहसास हैं सबों के सांसों में 
ये वो क़तरा है जो सबों के रग़ों में होती है

माकूल वक़्त इश्क की कभी शर्त नहीं 
ये वो जज़्बा है जो हरेक दिलों में होती है

रूयाँ में खुशफहमी का इलाज़ न शायद 
ये वो शब है जिसकी सहर नहीं होती है

साल से मरासिम का ख़्वाब नहीं 'शहाब'
मुख़्तसर हर पलों में दिल फ़ना होती है


बुधवार, 18 मार्च 2015

चैती बयार


पिया चैत के पुरवा बयार से चुन्दरिया लहर उठे
रामा कोयली के बोलियाँ से जिया में कसक उठे

डोली में लिए अमिया महुआ चैता कहार चहक उठे
फगुआ कहत कब बसंत में  चैती बयार दमक उठे

रूनी झुनि बाजे पायल  जब कमरिया लचक उठे
कमानी अखियों के प्रेमतीर से कलेजा धड़क उठे 

अमिया और महूलिया के खूश्बू से भोर महक उठे
जब गेहूँ काटे जाये सांवरिया मनवा में दहक उठे

सेजिया के  सलबट  में खोयी  देहिया झनक उठे 
परदेशिया बालम तेरे आने से  तन मन बहक उठे

सैयां  संग सेजिया में रात भर चूड़ियां  खनक उठे
बिजली करड़कने से रतियाँ में चोलिया मसक उठे



मंगलवार, 3 मार्च 2015

होली के रंग


खेतों में इठलाती बलखाती गेंहूँ की बालियां
झूमती इतराती लहलहाती आम की मंजरियाँ 
सरसों के पीली सेज में मगन प्रकृति रसिया
बसंत श्रृंगार में गुलाबी रंग लगा दे माहियां

अल्हड़ बसंती पवन मदहोश है पिए भंगिया
रंगोंत्सव में चहुँ ओर उमंग में मगन गोपियाँ
मृदंग करताल बीच थिरक रही छम छमियां
लटक मटक चहक के राग सुनावें कोयलियां

चंपा चमेली जूही सब एक रंग है मेरे बगिया
आज पिचकारी से छुट रही इंद्रधनुषी गोलियां
लाल पीला गुलाबी केसरिया से भीगे चुनरिया
सांवरे सलोने अपने ही रंग में रंग दे अंगिया

गुलाबी फुहार में सराबोर बहारों की शोखियाँ
रंगों की रंगत चढ़ी है हर डगर में रंगरेलियां
सुध बुध खोये एक दूसरे को लगाये छतियां
मृदुंग मँजीरा झांझ थाप पे फ़ाग खेले गोरिया

अपने ही धुन में मस्त हैं दीवानो की टोलियां
आज सांसों के लय छंद में घुल जा साथियां
अंग अंग में फाल्गुनी बयार से जले देहिया
निशा में प्रणयी पीया सेज में तोरे निंदिया

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

तमन्ना-ए-तिरंगा


जश्न मनाने की ख्वाहिश हिन्द भूला ना  पाया
मेरे दोस्त तुम्हारी कोशिशें हमें हिला ना पाया 
  
तुम उम्मीदों के दिए जलाने के लिए बेताब 
हम तेरे उम्मीदों के तेल से तुझे जला दिया  

तक़सीम की  राह चले तुम दिलों में  भरे तेज़ाब 
जो डंक तुमने सहेजे थे उसी ने तुझे रुला दिया 

खेल तुमने खेला सालों से मन में लिए दुहराब
तेरे मकसद को आज ग्यारह ने दहला  दिया 

तमन्ना है इस  तिरंगे की सब हो  कामयाब 
जिसे वक़्त ने नायाब तिरंगा में नहला दिया 


शनिवार, 17 जनवरी 2015

कातिल पुतली


सफेद समंदर में तैरता स्याह छुईमुई कातिल पुतली,
पुरनूर बरसती है दिलों में तेरे नयनों के खुल जाने सेI

आसमान की पेशानी को चूमती हुई ये सुरमई बदली, 
कौंधती है बिजली सांसों में तेरे अलकों के लहराने से I

उफ़क़ में मिलती धरा नभ की ये चम्पई ओंठ रंगीली,
तार झंकृत होते हैं दिलों की तेरे लवों के कंपकंपाने से I

शफ़ाफ़ साक़ी-ए-गुलफाम की मानिंद अलसाई छबीली,
मदहोशी छा जाती हैं फिजां में तेरे जुवां के अंगराने सेI

माघ में शबनमी बूंद में नहाई रात थरथराई  सजीली,
चमन खुल जाती हैं तेरे रुख में हिलकोरे बन जाने से I