मैं वो शायर नहीं जो फूलों से रंग-ओ -बू चुराता हूँ
रुबाई तुम्हें मुबारक़ मैं मर्सिया से भी रंग जमाता हूँ
मैं वो मांझी नहीं जो मझधार में भंवरों से डराता हूँ
साहिल मिले न मिले मैं लहरों में भी सुर सजाता हूँ
मैं वो बुझा शख्श नहीं जो ख़ारों से दामन बचाता हूँ
चमन मुबारक़ हो रफ़ीक़ मैं काँटों से भी निभाता हूँ
मैं वो सज़र नहीं जो सब्जे मंज़र को गले लगाता हूँ
नशेमन शाद हो तेरा मैं सहरा में भी ख़ुशी मनाता हूँ
मैं वो बंजारा नहीं जो कारवां में कदम बढाता हूँ
मंजिल रब जाने मैं सहरा में भी मक़ाम बनाता हूँ