मंगलवार, 16 जनवरी 2018

मां सुन लो ना

चाँद को धरती पर उतरूं मां सुन लो ना सुन लो ना 
मैं तेरा एक आशिक हूँ मां सुन लो ना सुन लो ना । 

तेरे सीने में तिंरगा लहराने के खातिर ये नील गगन 
जीवन अर्पण कर सकता हूँ मां सुन लो न सुन लो ना। 

केशरिया ज्वाला जग में बिखेरने के खातिर ये दहन 
खुद हवन कर सकता हूँ माँ सुन लो न सुन लो ना। 

सादगी  में सराबोर करने के खातिर ये वतन  
दो जहाँ लूटा सकता हूँ माँ सुन लो न सुन लो ना। 

हरियाली और खुशहाली फैलाने की खातिर ये चमन
रक्त से दामन भर सकता हूं मां सुन लो ना सुन लो ना । 

शांति और समृद्धि फैलाने की खातिर ये क़फ़न 
तीन रंगों में समा सकता हूँ माँ सुन लो न सुन लो ना । 

सुरभित तेरे कण कण को करने के खातिर ये पवन 
सुबासित कर सकता हूँ मन माँ सुन लो ना सुन लो ना ।

नए साल में

आरजू है खुदा जीवन में आये बहार नए साल में
नशेमन में हो दौलत और शिफा इस नए साल में।
मिन्नत है ये मालिक से सबके हो सपने साकार
दिलों में शहनाई और लवों में तराना नए साल में।

बेशकीमती मीना  जवाहिरात से सजे बाजार 
हिन्द में मुफलिसी का अब अंत हो नए साल में।

आंखों में हो नूर और सुर्ख हो सबों के रुखसार
मुल्क में मुक्कमल रहे इंसानियत नए साल में। 

इल्तिजा है रब दशहतगर्दी का बन्द हो कारोबार
अमन का ये मशाल बुलंद हो इस नए साल में।


रविवार, 24 दिसंबर 2017

#वजूद

एक चिंगारी हूँ 
नहीं मिटेगी रंगे दमक मेरी
गर बुझ भी गया 
एक दिन सितारों में समा जाऊँगा।

वो अमरवेल हूँ 

नहीं मिटेगी वजूद मेरी
गर जल भी गया 
एक दिन शाख में लिपट जाऊँगा।

वो गुले गुलशन हूँ 

नहीं मिटेगी खूशबू मेरी
गर टूट भी गया 
एक दिन गुल-ऐ-आब में महक जाऊंगा।

वो सूर साज़ हूँ 

नहीं मिटेगी खनक मेरी
गर बेताल भी हुए
 एक दिन झरनों में समा जाऊंगा।

एक कातिब हूँ 

नहीं मिटेगी हस्ती मेरी
गर मिट भी गया
एक दिन हिन्द-ए-दस्तावेज में रह जाऊँगा।

शनिवार, 14 जनवरी 2017

#मक़ाम

मैं वो शायर नहीं जो फूलों से रंग-ओ -बू चुराता हूँ

रुबाई तुम्हें मुबारक़ मैं मर्सिया से भी रंग जमाता हूँ


मैं वो मांझी नहीं जो मझधार में भंवरों से डराता हूँ

साहिल मिले न मिले मैं लहरों में भी सुर सजाता हूँ 

मैं वो बुझा शख्श नहीं जो ख़ारों से दामन बचाता हूँ

चमन मुबारक़ हो रफ़ीक़ मैं काँटों से भी निभाता हूँ


मैं वो सज़र नहीं जो सब्जे मंज़र को गले लगाता हूँ
नशेमन शाद हो तेरा मैं सहरा में भी ख़ुशी मनाता हूँ

मैं वो बंजारा नहीं जो  कारवां में कदम बढाता हूँ

मंजिल रब जाने मैं सहरा में भी मक़ाम बनाता हूँ

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

फ़ना

डूबा डूबा सा रहता हूँ 
पल पल तेरी  निग़ाहों में 
सिमट सिमट सा जाता हूँ 
पल पल तेरी पनाहों में


घुला घुला सा रहता हूँ 
हमदम तेरी आहों में

खोया खोया सा जाता हूँ 
हरदम तेरी बाँहों में


बिखरा बिखरा सा रहता हूँ
रहबर  तेरी राहों में

महक महक सा जाता हूँ
हम दम तेरी चाहों में

सहमा सहमा सा रहता हूँ
हमदम तेरी विरहों में
बँधा बँधा सा जाता हूँ 
हमसफ़र  तेरी गिरहों में 

संवरा संवरा सा रहता हूँ 
सनम तेरी शबीहों में
फ़ना फ़ना हो  जाता हूँ
दिलबर तेरी रूहों में 


गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

उम्मीद


चेहरे पर लकीर आ भी जाये  फ़ासिला कम हो
गुरब्बत के दिन चाहे आये दिलों में गिला कम हो 

सफर में है हम संग की तरह इस भरी दुनिया में 
इश्क असर हो गर शिकवों का दाखिला कम हो  

ज़लज़ला भी आये तो आने दो दिलों की बस्ती में  
रिस्ताए इमारत बनेगी गर बुनियाद हिला कम हो  

परवाना शमा की तरह जिए जाओ मदमस्ती  में 
अब रकीब हर नफरत का ये सिलसिला कम हो

सहरा में शजर की परवरिश के लिए हम वतन 
दोस्त गुजिश्ता रंजिशें जो हो अब सिला कम हो 

वक़्त की उम्र


वक़्त की उम्र कितनी कोई हमें हसाब बता दे
कल आज और कल के राज को अजाब बता दे

सफर में मौत कब होती ये कोई जवाब बता दे
पलों में फ़ना जिंदगी को  कोई बेहसाब बता दे

आने जाने की आँख मिचौनी को सबाब बता दे
जीने मरने  के खेल को कोई लाजबाव बता दे

सब्ज उगते रहेंगे कोई  रंगो का पड़ाव बता दे
महफ़िल और  कारवां का कोई ठहराब बता दे

लम्हों में सालों जीने की  कोई ख्वाब बता दे
क़तरा-समंदर में  भेद नहीं इसे शहाब बता दे