शनिवार, 7 सितंबर 2019
मंगलवार, 9 जुलाई 2019
फसल
आप मीठे ख्याली खेतों की इक फसल हो
या सांसों से उपजी हुयी इक ग़ज़ल हो
या सांसों से उपजी हुयी इक ग़ज़ल हो
वक़्त गुजरेंगे जैसे हाथों से फिसलते रेत
लेकिन रगों में दौड़ने वाली तुम जल हो
तराने गूजेंगे जैसे पंचम से निकलते गीत
आप खुद में ही मिसरा ऐ बेमिसाल हो
धनक में ना समाने वाली इक रंग नायाब
आप जिस्म और जेहन से परे ख्याल हो
महताब की दमकते नूर क्या औकात
आप कहकशाँ में शिहाब-ए-जमाल हो
[धनक-Rainbow, जेहन -Mind, महताब - Moon,
कहकशाँ - Galaxy, शिहाब - Shooting star, जमाल-Charm/beauty]
शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2018
हयात

बसंती बयार में इतराते गुलों की हस्ती तमाम होती है
मौसमें बहार ही नहीं पतझर
के दिन भी सतरंगी होती हैं
शरारे शमा में
मचलते बहकते परवाने को कहाँ मालूम
रूह-जिस्म का बाबस्ता कितना
इक दिन ये फ़ना होती है
हाथ से फिसलते गिरते रेत
की तरह उम्र को कहाँ मालूम
लिबास बदलने में गुज़री इक
दिन हयात भी अजल होती है
वक़्त के मारे कराहते बिलखते
दर्देदिल को कहाँ मालूम
खिजां व बहार
की तरह हर गम की इक इंतिहा होती है
खिजां में शाख
से टूटते बिखरते पत्तिओं को कहाँ मालूम
कायनात में कब तक शिहाब रात
की इक सहर होती है
गुरुवार, 2 अगस्त 2018
वियना की बर्फीली रात
आज खिड़की से बरफ़ में लिपटी हुई दरख्तों को देखता हूँ,
सफेद लिवास में ख़ामोश जमीन के सब्ज को देखता हूँ।
इस दुधिया रात में सितारों के दीदार की ख्वाहिश लिए,
आज महताब को बेइंतहा फलक में खोजता हूँ।
आज महताब को बेइंतहा फलक में खोजता हूँ।
सफ़ेद और स्याह की मानिंद है आज रंग क़ायनात का,
आज वाह रे कुदरत जमीन पर क़हक़शाँ को देखता हूँ ।
आज वाह रे कुदरत जमीन पर क़हक़शाँ को देखता हूँ ।
परिंदों का आशियाँ सलामत रहे बर्फीले शाख पर,
आज बर्फ के पिघलने में एक नज़्म सुनता हूँ।
आज बर्फ के पिघलने में एक नज़्म सुनता हूँ।
ना कोई शोर हर तरफ है आज सन्नाटा का कारोबार,
स्तब्ध पलकों से दिल्ली की रौनक को वियना में ढूंढता हूँ।बसंत बहार
वो दिन थे कैसे जब पीली धूप का रहता था इंतज़ार
कहीं सरसों के पीले फूल कहीं मटर के बैगनी फ़ूल से
अलसी के नीली फूलों से बसंत का सजता था सिंगार
कहीं बेल की खूशबू और कहीं मिश्रीकंद के स्वाद से
भांग की हरियाली व महुआ से शोभित होता था बहार
कहीं सेमल के लाल फूल और कहीं खट्टे बेर के फलबागमती के किनारे किलकारी करता था किलकार
कहीं पूजा की तैयारियां कहीं अल्हड़ कोयल की तान
बसंत पंचमी में हर दिशा व मन में बजता था सितार
एक सिहरन सी होती थी तन में जब बहता था बयार
कहीं सरसों के पीले फूल कहीं मटर के बैगनी फ़ूल से
अलसी के नीली फूलों से बसंत का सजता था सिंगार
कहीं बेल की खूशबू और कहीं मिश्रीकंद के स्वाद से
भांग की हरियाली व महुआ से शोभित होता था बहार
कहीं सेमल के लाल फूल और कहीं खट्टे बेर के फलबागमती के किनारे किलकारी करता था किलकार
कहीं पूजा की तैयारियां कहीं अल्हड़ कोयल की तान
बसंत पंचमी में हर दिशा व मन में बजता था सितार
मंगलवार, 16 जनवरी 2018
मां सुन लो ना
चाँद को धरती पर उतरूं मां सुन लो ना सुन लो ना
मैं तेरा एक आशिक हूँ मां सुन लो ना सुन लो ना ।
तेरे सीने में तिंरगा लहराने के खातिर ये नील गगन
जीवन अर्पण कर सकता हूँ मां सुन लो न सुन लो ना।
केशरिया ज्वाला जग में बिखेरने के खातिर ये दहन
खुद हवन कर सकता हूँ माँ सुन लो न सुन लो ना।
सादगी में सराबोर करने के खातिर ये वतन
दो जहाँ लूटा सकता हूँ माँ सुन लो न सुन लो ना।
हरियाली और खुशहाली फैलाने की खातिर ये चमन
रक्त से दामन भर सकता हूं मां सुन लो ना सुन लो ना ।
शांति और समृद्धि फैलाने की खातिर ये क़फ़न
तीन रंगों में समा सकता हूँ माँ सुन लो न सुन लो ना ।
सुरभित तेरे कण कण को करने के खातिर ये पवन
सुबासित कर सकता हूँ मन माँ सुन लो ना सुन लो ना ।
नए साल में
आरजू है खुदा जीवन में आये बहार नए साल में
नशेमन में हो दौलत और शिफा इस नए साल में।
मिन्नत है ये मालिक से सबके हो सपने साकार
दिलों में शहनाई और
लवों में तराना नए साल में।
बेशकीमती मीना व जवाहिरात
से सजे बाजार
हिन्द में मुफलिसी का अब अंत
हो नए साल में।
आंखों में हो नूर और सुर्ख
हो सबों के रुखसार
मुल्क में मुक्कमल रहे इंसानियत
नए साल में।
इल्तिजा है रब दशहतगर्दी
का बन्द हो कारोबार
अमन का ये मशाल बुलंद हो इस
नए साल में।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
