शहर से देहात-ऐ-तलक ये जीवन थम सा गया हैआशियाँ में हयात बर्फ की तरह ज़म सा गया है
शनिवार, 18 अप्रैल 2020
ठहराव
बस्ती में इंसानों को मयसर नहीं आब-ओ-दाना
मासूमों की बेबसी देखकर आंखे नम सा गया हैं
टूट गयी सब हसरतें व छीन गयी हाथों से निवाले #कोरोना के इस दौड़ में पमालों का दम सा गया है वीरां हुए सब रास्तें और मंज़िलें हुयी अब ओझल जुदा ऐसे हुए सब लगता है कोई हम सा गया है शिफा की उम्मीद में अहाते में कैद व सहमे हम
रविवार, 29 मार्च 2020
हौसला
बेज़ारी के इस दौर में तन्हा तन्हा सब्र से गुजारें
लवों पे दुआ रख दोस्त इसका असर भी देखेंगे।
जुगनू की रौशनी में गुज़र जाएगी दो-चार लम्हें
स्याह शब के सीने से चीरता सा सहर भी देखेंगे।
टूट ही जातें हैं शाख़ों से पत्ते खिज़ा के दौर में
हिम्मत रखिये चमन में बहारे मंज़र भी देखेंगे।
जहां में मातम और खौफ में आज है इंसानियत
रफ्ता रफ्ता कातिल का थमता ज़हर भी देखेंगे।
जब ज़ज़्बात की कश्ती दाल दी हैं तूफान में
उम्मीद रख शहाब समंदर का लहर भी देखेंगे।
शनिवार, 28 दिसंबर 2019
असास-ऐ-इश्क
सर्द सुबह में आज कोहरा घना हैं
सफेद रंग से आबो फ़िज़ा सना हैं।
राह में रहबर आज भले ही न मिले
लेकिन किसने कहा चलना मना है।
न टूटेगी ये हमारी इश्के मनाज़िल
दिलों के राब्ता से आशियां बना है।
रूहों का मरासिम सदियों में नहीं
तेरे सोहबत में चंद लम्हें फ़ना हैं।
जुदा है रंग-ओ-बू लेकिन राहें एक
असासों के दम पे आबाद तना है I
सफेद रंग से आबो फ़िज़ा सना हैं।
राह में रहबर आज भले ही न मिले
लेकिन किसने कहा चलना मना है।
न टूटेगी ये हमारी इश्के मनाज़िल
दिलों के राब्ता से आशियां बना है।
रूहों का मरासिम सदियों में नहीं
तेरे सोहबत में चंद लम्हें फ़ना हैं।
जुदा है रंग-ओ-बू लेकिन राहें एक
असासों के दम पे आबाद तना है I
शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019
खूबसूरत जिंदगानी
गुलों से खूश्बू व झरनों से मौज़ चुराकर देखिये।
इल्तज़ा है तितलियों के रंगों में नहाकर देखिये।
जन्नत की ख्वाहिश में बिता दी हमनें ये उम्र
खूबसूरत है हर लम्हा उसमें उतरकर देखिये।
अंधेरे के साये में क्यों करते हो जाया जिंदगानी
धूप कितनी सुनहरी है उसमें ठहरकर देखिये।
शिक़वे-शिकायत में आज गुमराह इंसानियत
मिलेंगें दोस्त रकीबों के शहर में खोजकर देखिये।
बेबजह गिला व रंजिसे ना रखिये सीने में हुज़ूर
बिखरेगी नूर मेरी आँखों में जरा बसकर देखिये।
इल्तज़ा है तितलियों के रंगों में नहाकर देखिये।
जन्नत की ख्वाहिश में बिता दी हमनें ये उम्र
खूबसूरत है हर लम्हा उसमें उतरकर देखिये।
अंधेरे के साये में क्यों करते हो जाया जिंदगानी
धूप कितनी सुनहरी है उसमें ठहरकर देखिये।
शिक़वे-शिकायत में आज गुमराह इंसानियत
मिलेंगें दोस्त रकीबों के शहर में खोजकर देखिये।
बेबजह गिला व रंजिसे ना रखिये सीने में हुज़ूर
बिखरेगी नूर मेरी आँखों में जरा बसकर देखिये।
शुक्रवार, 27 सितंबर 2019
रंगो के तिलिस्म
मगरिब में ढलते रंगो के तिलिस्म में खनक किसका है
ये उड़ते रंगो के सैलाब के जिस्म में धनक किसका है
कोयल की कूक या आबे बहिश्त से निकलती ये तान
मौशिकी और फ़िज़ां के मक़ामात में झनक किसका है
फ़िज़ां के रुखसार में या अब्र में लिपटी ये चम्पई लेप
रंगो के इस बाजार के कारोबार का भनक किसका है
शहाब के ज़जीरे में नायब रंगों का ये लाज़बाब रक़्स
रूहानी तराने व् दिलक़श बंदिश में छनक किसका है
ये कौन सा रंगसाजी या मुसब्बिर की नामचीन शबीह
शिहाब उफ़क के रुख को रंगने का सनक किसका है
ये उड़ते रंगो के सैलाब के जिस्म में धनक किसका है
कोयल की कूक या आबे बहिश्त से निकलती ये तान
मौशिकी और फ़िज़ां के मक़ामात में झनक किसका है
फ़िज़ां के रुखसार में या अब्र में लिपटी ये चम्पई लेप
रंगो के इस बाजार के कारोबार का भनक किसका है
शहाब के ज़जीरे में नायब रंगों का ये लाज़बाब रक़्स
रूहानी तराने व् दिलक़श बंदिश में छनक किसका है
ये कौन सा रंगसाजी या मुसब्बिर की नामचीन शबीह
शिहाब उफ़क के रुख को रंगने का सनक किसका है
मंगलवार, 24 सितंबर 2019
अफ़साने
मुख्तलिफ थी कल तक हमारे
अफ़साने अब वो तमाम देखते हैं
जन्नत की खातिर तिनका तिनका बिखेरा उम्र भर गुलिश्तां में
कल तक चश्में जुस्तजू
थी दो दिलों की अब वो अवाम देखते है
सहर से शामे तलक सीने
में उभरता रहा आशना-ए-रोशनाई
सुर्ख हुए चश्म-ए-समंदर
की गहराई, अब वो कलाम देखते हैं
जन्नत की खातिर तिनका तिनका बिखेरा उम्र भर गुलिश्तां में
दो गज़ का नशेमन बनाऊं
कैसे जान अब वो क़याम देखते
है
अबीर की खवाहिश लिए लूटा
दी बहार-ए-गुलशन की खुशबू
खिजां का दौर इस तरह चला जिंदगी अब वो मशाम देखते है
अजल और मुदाम हुए हमारे
दिलों के ये सूफियाना अफ़साने
बदन और रूह का यह दमाम रिश्ता अब वो पयाम देखते है
शज़र से टूटते जर्द पत्तों
को कहाँ उसकी ये हकीकत मालूम
पुरनूर हो क़मर में रंग
जमाल शिहाब अब वो मक़ाम देखते है
[मुख्तलिफ-Specific,
चश्में जुस्तजू- dream in eyes,
आशना-ए-रोशनाई-ink of love, मशाम-Fragrance,
शजर-tree,
जर्द पत्तों-
yellow leaves, क़याम-Stay, मुदाम/
दमाम -eternal,
पयाम-message, क़मर-moon, शिहाब-Shooting star]
शनिवार, 7 सितंबर 2019
कमर भी शरमा गया
सहर में कौतूहल में थे हिन्द के दानिश फ़रिश्ते,
फैसले की घड़ी में हमारा विक्रम से रiफ्ता टूट गया।
फैसले की घड़ी में हमारा विक्रम से रiफ्ता टूट गया।
खोजी कारवां चला था बर्फ़ीली वादियों के जानिब,
मक़ाम हासिल न सही तिरंगा का निशा छोड़ आया।
गुमां है सबसे किफायती था अपना सफ़र हमारा,
दूर से चांद को घूमने के लिए सियारा छोड़ आया।
दूर से चांद को घूमने के लिए सियारा छोड़ आया।
फ़ज़ा में नए इल्मी शाख फिर नुमायां होंगे शहाब,
माहताब क्या कहकशां में जाने का करार आया
माहताब क्या कहकशां में जाने का करार आया
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