गुरुवार, 18 मार्च 2021

प्यम्बर

डूबा दूँ दरिया के प्यास को समंदर बनना चाहता हूँ

सोख लूँ नमी हर आँखों से कलंदर बनना चाहता हूँ

 

दोस्तों से ही दिलदारी करते हुए पाया हूँ जमाने को 

जीत लूँ दिल दुश्मनों का सिकन्दर बनना चाहता हूं

 

मिलें सबोंको अपने दिल का साथी इस अंजुमन में 

आबाद कर दूं नशेमन को स्वयंवर बनना चाहता हूँ

 

हर शख्स है परेशान कभी जलजलों कभी सैलाब में 

मिटा दूं सालभर की रंजिशे नवम्बर बनना चाहता हूँ 

 

पयाम सुनकर बेबसों के रूख पर जाये हलचल

झूला दूं लबों पर मुस्कुराहट प्यम्बर बनना चाहता हूँ


रविवार, 31 जनवरी 2021

जिंदगी की राह

कहकशां में हर सितारों पे नज़र रखते हैं
जिंदगी तेरी राहों पे जारी सफर रखते हैं

दिलों में तेरी अक्श व लबों पर तेरा नाम
सुबहो शाम और पहर दो पहर रखते है

जुगनुओं से कह दो कि रहे वो औकात में 
दिल में शोला व निगाहों में शरर रखते है 

मंजर और पसमंज़र दोनों है निगाहों में
चमन क्या वो सहरा में भी शज़र रखते है

नेकी की राह में फ़िदा है तुम पर सनम
दिन व रात तेरी जलवों में असर रखते है

मगरिब मशरीक में जहाँ भी हो नुमाया 
पल पल वो तेरी सेहत की खबर रखते हैं 

आब आतिश फ़ज़ाओं में वो दम कहाँ 
हर सूरत में हम अपना खिज़र रखते हैं

जिंदगानी के वास्ते सरमाये हो तंग जितने 
हाथों में फुलूस नहीं जान जिगर रखते हैं 

परवाज़ लगाते हैं परिंदों जैसे फलक में 
सज़र की तरह मिटटी में जज़र रखते हैं
 
तकरीर करने का कहाँ इल्म नहीं मालूम 
ढाई आखर में कहने का हुनर रखते हैं 

कहकशां (Universe) शरर (Spark/gleam) 
जलवों (Show/splendor) मगरिब (West) 
मशरीक (East) खिज़र (Immortality ) 
फुलूस (Penny/Medieval coin ) जज़र (root) 
तकरीर (Speech) इल्म/हुनर  (Knowledge) 


शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

चर्चा

हसीं रुखसार में शबनमी आब मिलतें है 
चर्चा है तेरे लबों पे सुर्ख गुलाब मिलते हैं

फलक झुक जाता है अपनी घटा लेकर
चर्चा है तेरे जुल्फों में स्याह सहाब मिलते हैं

साजिन्दगी करती है कोयल तेरी बातों से 
चर्चा है तेरे सांसों में ताने रुबाब मिलते है

चलती फिरती मयखाना है तेरी नम आँखे 
चर्चा है तेरे चश्मों में सफ़ेद शराब मिलतें हैं

सिजदा करतें हैं इस शहर के मासूम दीवाने
चर्चा है तेरे कूचों में इश्के किताब मिलतें हैं

कभी न गया कोई मायूस इस कशाने से 
चर्चा है तेरे दर पे माकूल हिसाब मिलते हैं

मुजरिम हो जाते हैं बरी हर इल्ज़ाम से 
चर्चा है तेरे सोहबतों में सवाब मिलते हैं

तिलिस्मी समा डूब जाता है आगोश में
चर्चा है तेरे महफ़िल में सराब मिलतें हैं

सुरीला मौशिकी

सुरीला सुरीला मौशिकी
कतरा कतरा जिंदगी
दिलनशीं बता ये
गज़ले मतला क्या है।

ठहरा ठहरा आशिक़ी
गुजरा गुजरा दिल्लगी
हमनशीं सुना ये
मुआमला क्या है।
 
सहरा सहरा नग्मगी
गहरा गहरा बस्तगी
गमनशीं बता ये
दिले फासला क्या है।

निखरा निखरा चेहरगी
पहरा पहरा पर्दगी
पर्दानशीं बता ये
चश्में बला क्या है

लहरा लहरा तिश्नगी
ज़हरा ज़हरा शोलगी
जानशीं बता ये
रूहे  वला क्या है

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

अमन के परचम

पीछे से कभी किसी पर वार नहीं करते
किसी जंग के लिए ललकार नहीं करते

अमन के परचम लहराते है हमारे लोग
तारीख़ गवाह है कभी यलगार नहीं करते

कुदरती सरमाये से लबरेज हमारी जमीं
इसलिए हम मौत का कारोबार नहीं करते

बेपनाह ख्वाहिशें न रखते हमवतन मेरे
बेवजह कन्धों को चार चार नहीं करते

जो आया समा गया इस हसीं दरिया में 
हम लुटेरों का भी तिरस्कार नहीं करते

सदियों से अपनी हदों में रहने वाले कौम
बेमतलब सरहदों का विस्तार नहीं करते

सोमवार, 28 सितंबर 2020

हमारी आशनाई

आने से उनके ये जर्द सुबह नूरानी हो गयी है
उनसे मिलके सिंदूरी शाम सुहानी हो गयी है
 
जैसे ग़ज़लों में काफिया से आ आती है जान
लबों के खुलते ही फ़िज़ाएं तरानी हो गयी है
 
जैसे बहारों में खिलते हैं शज़र में सब्ज पत्ते
तुम्हारे आने से अब ये मंज़र धानी हो गयी है
 
जैसे जुदा हो जाते हैं शाखों से पत्ते खिजां में
तेरे जाने से अब दिन भी शबानी हो गयी है
 
जैसे परवाने जल जाते है शमा के आगोश में
हमारी आशनाई भी एक कहानी हो गयी है

बुधवार, 23 सितंबर 2020

यादें

गांव और देहात अब मेरे लिए एक नाम रह गया है
करवां का मकाम ढूंढना ही सिर्फ काम रह गया है

सफर तो शुरू किया था तुम्हारे बगल के चरपाई से
यादों के झरोखें में उस चारपाई का फाम रह गया है

वह छोटा सा कमरा दिल्ली के एक तंग मुह्हले की 
कभी कभी गुदगुदाती  वो मजलिसे शाम रह गया है
 
झरोखों से उन तंग गलियों में उसे बार बार झाँकना
वो निगाहें की शोखी वो अफ़साने आम रह गया है 

आँखों में उन सपनों का हर रोज बनता टूटता महल
यादों में हमारे दो चार घुट पीये हुए जाम रह गया है