गुरुवार, 2 सितंबर 2021

शहरे दिल्ली

मिरी तो कोई औकात नहीं है शहरे दिल्ली में 
ग़ालिब उन तंग कूचे से कोई निकलती तो है।
 
ख़ुसरो मीर दाग मोमिन हर कोई रूहजादा हुए 
उनके अल्फ़ाज़ों की सिसकियाँ निकलती तो हैं।

कुछ हमसाया हुए राह में कुछ वफ़ा न कर पाए
लेकिन उसके यादों की कशिश निकलती तो है। 

हज़ारों सालों में मिट न सकी मिरी फितरत यारों
नादिर के क़त्लेआम की ख़बर निकलती तो हैं।

बनता रहा है हमारा ये नशेमन टूटकर सात बार
चुनांचे हमारे माती से कुछ ख़ुशबू निकलती तो है।

रविवार, 8 अगस्त 2021

खोया-पाया

हम मंजिलों के तलाश में इस कदर बेहोश हुए हैं
गरचे कुछ जो मकाँ थे वो अब हमसे छूट गए हैं

किसने क्या खोया क्या पाया इसका हिसाब नहीं
वैसे भी अब ये सब सोचने का वक़्त बीत गए हैं

शहरवाले पहले से अपने अपने दरबों में थे कैद
अनजान परिंदों का क्या वह भी अब घूट गये हैं

बाकई में कस्बों की कभी नही थीं ऐसी में फितरत
लेकिन कस्बों के बाशिंदे भी महंगाई से लूट गये हैं

गाँववाले भी सीख गए हैं अब हर वो तमाम इल्म
शहरों की तरह गांव में दिलों के  रिश्ते टूट गए हैं

बुधवार, 21 जुलाई 2021

जान-निसार

ये मिल्लत तुझे हम बेपनाह प्यार करते हैं 
नेकी के राह में हम जान निसार करते है 

किसी के आँखों में कभी न आ जाये नमी
जान का क़तरा क़तरा हम फुवार करते हैं 

तेरा दामन और आसियाना सलामत रहें 
धन दौलत को सदके से  बेज़ार करते  हैं

तुझ से जुदा हमारे जीस्त का वजूद कहाँ 
ये वतन तुझे हम अश्क बेशुमार करते हैं
 
कोई मासूम कोई मजलूम भूखा ना  रहें 
मालिक से यही  हर बार गुहार करते हैं 

संगदिली व तंगदिली से हमें निजात मिले 
आज दिल से इक ऐसा ही करार करते हैं 

ईद सबके घरों में यूँ ही मनाई जाती रहें  
चलो इसके लिए उपाय हज़ार करते हैं 

शनिवार, 17 जुलाई 2021

अल्फाज़

शायद मैं चन्द अल्फाज़ हूँ मेरा  कोई मकां नहीं
फैल जाता हूँ स्याही की तरह जिसकी इंतहां नहीं

कितने नायाब हरफ़ सजा रखें अपनी गुलशन में
कैसे बताऊं इसे अपने रूप का कोई गुमां नहीं

धीरे धीरे मेरा वजूद घुल जाता हैं इन्हीं फजाओं में
मेरे सिम्त की कोई सरहद नहीं कोई निशान नहीं

किसके जानिब अपनी अल्फ़ाज़ों का रूख करूँ
जिसकी मुक़्क़मल जमीन नहीं कोई आसमां नहीं 

मरासिम है हिंदवी से कभी रेख़्ता से कभी उर्दू से
इन चंद अशआर के सीवा मेरी कोई ज़ुबान नहीं 
  
भटकता हूँ कभी गंगा कभी सिंधु के वादिओं में 
बेपनाह तिश्नगी का अनवरत सफर आसान नहीं

शनिवार, 15 मई 2021

ज़मीर के सौदागर

हिन्दे हयात अब सिर्फ इक घोंसला बनकर रह गया है,

हमवतनों का जान सिर्फ यहाँ हौसला बनकर रह गया है।


वुहानी के दौर में ज़मीर का सिलसिलेवार हो रहा सौदा,

इंसानियत के बिना जिस्म खोखला बनकर रह गया है।


दवा दारु व हवा की खोज में दर व दर भटकते क़दम,

हाँफती सांसों में जान उड़न खटोला बनकर रह गया है।


सियासतदां से भी बदतर अनेक बाज बैठे हैं ताक में,

हर नफ़्स इन शिकारियों का चोंचला बनकर रह गया है।


शिफाखाने से श्मशाने तलक हो रहा इंसानियत जार जार,

सिक्कों के चाह में चन्द शख्स दोगला बनकर रह गया है।


इन इज़ारेदारों के शोर में सहमी दबी मासूमों की जुबान

आम आदमी की आवाज अब तोतला बनकर रह गया है


रविवार, 21 मार्च 2021

लाज़बाब

पढ़ के देखो सनम खुली क़िताब हूँ 
मैं बेहद बेमिसाल और बेहसाब हूँ

चश्में हटाकर देखिए मेरी रंगत को
मैं लालासाँ लबरेज़ व लाजवाब हूँ

तनाफुस से भी खुश्बू भर जाएगी  
मैं गुल गुलबार और गुले- ख्वाब हूँ

घर कर जाऊंगा तेरी अल्फाजों में
मैं जूनूनी जांबाज़ जमीनीजनाब हूँ

फज़ाओं में शबनम के ताजग़ी में
मैं शबेसहर में शुमार शामे शराब हूँ




शुक्रवार, 19 मार्च 2021

नादानियां

नादान हूँ समन्दर में तो रहा लहर नहीं देखा
पीता रहा इस तरह उम्र भर खुमर नहीं देखा

पसीने से लथपथ होकर पहुँचा था विस्तर पे
बिताया रात फलक के नीचे क़मर नहीं देखा

रोजमर्रा में शिकस्त कैसे हो नगीनों पे नज़र 
दिन कटें सदफ़ के बाज़ार में गुहर नहीं देखा

तेरे इश्के जूनूनीयत का आग यूँ लगा दिल में
आतिस के दरम्यान रहते हुए शरर नहीं देखा

तेरी नज़रों में खोया कितने नज़रों का नज़र
नज़रों में बसा उन नज़रों का हुनर नहीं देखा

मसरूफ थे मंजिल के याद में डगर नहीं देखा
गुजरा अपना कारवां पहर दो पहर नहीं देखा