सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

आने दो

निग़ाहों में सुर्ख लपटें चिंगारी को आने दो 
वफ़ा भी करूंगा सनम खुमारी को आने दो 

यार कहते हैं कि मोहब्बत गज़ब की बला है 
मान लूंगा लेकिन इस बीमारी को आने दो 

पलकें बिछाए मैं बैठा रहा कल शब भर 
टूट भी जाएगा ऐतवार बेदारी को आने दो 

उम्मीद हैं आएंगे वो मेरे काशाने में एक दिन 
सब्र रखिये जरा मौसमें करारी को आने दो 

दीदार की आरजू में गुज़रे दिन महीने साल 
छोड़ दूंगा इंतज़ार इल्में शुमारी को आने दो

सोमवार, 13 सितंबर 2021

दास्ताने दिल्ली

दिलबर हम दिल है दिल्ली है हर दिलजान है
गुरबत में या शोहरत में यहीं मेरी पहचान है

अरावली के दामन में छुपा हुआ है कितने राज़
यमुना के अनवरत सफ़र में कैद मेरी जान है

सदियों से बिछती है सियासत की विसात यहीं
तुग़लक़ मुग़ल अंग्रेजों की भी यहीं श्मशान है

छुप न सका सूरत मेरी जुल्म और  सितम से
तंगहाली में भी मिट न सका मेरी निशान हैं

सीने में बदस्तूर बसते रहें कारवां दर कारवां 
जर्रे जरा में जज्ब यहीं मेरी इश्के ईमान है

शनिवार, 11 सितंबर 2021

हिज़्र के दिन

 तुझसे कभी कभी छुप के मिलने के चर्चे अब सरेआम हो गए हैं।
मिलते हैं हम तुम लेकिन कितनों के दिल कत्ले आम हो गए हैं।

अमीनाबाद के गलियों में गुजारे हुए वो दो चार बेशकीमती लम्हें
तेरे हिज़्र में वो चन्द  हसीन लम्हें अब सालों में तमाम हो गए है।

भटक रही है किस क़दर मेरी राहे सिम्त ऐशबाग वा चारबाग में
मंजिले आलम की बात क्या कहें अब वो भी मक़ाम हो गए हैं।

मिल से गयें है मुख्तलिफ हमारे सितारों का चलन इस कहकशां में
जुदाई में दिन अब तो सहर की तरह और शब भी शाम हो गए हैं

नहीं भाता आजकल गंज और चौक के वो लजीज़ आबोदाना
गोमती के वादियों के आब की तासीर भी नायाब ज़ाम हो गए है


गुरुवार, 2 सितंबर 2021

शहरे दिल्ली

मिरी तो कोई औकात नहीं है शहरे दिल्ली में 
ग़ालिब उन तंग कूचे से कोई निकलती तो है।
 
ख़ुसरो मीर दाग मोमिन हर कोई रूहजादा हुए 
उनके अल्फ़ाज़ों की सिसकियाँ निकलती तो हैं।

कुछ हमसाया हुए राह में कुछ वफ़ा न कर पाए
लेकिन उसके यादों की कशिश निकलती तो है। 

हज़ारों सालों में मिट न सकी मिरी फितरत यारों
नादिर के क़त्लेआम की ख़बर निकलती तो हैं।

बनता रहा है हमारा ये नशेमन टूटकर सात बार
चुनांचे हमारे माती से कुछ ख़ुशबू निकलती तो है।

रविवार, 8 अगस्त 2021

खोया-पाया

हम मंजिलों के तलाश में इस कदर बेहोश हुए हैं
गरचे कुछ जो मकाँ थे वो अब हमसे छूट गए हैं

किसने क्या खोया क्या पाया इसका हिसाब नहीं
वैसे भी अब ये सब सोचने का वक़्त बीत गए हैं

शहरवाले पहले से अपने अपने दरबों में थे कैद
अनजान परिंदों का क्या वह भी अब घूट गये हैं

बाकई में कस्बों की कभी नही थीं ऐसी में फितरत
लेकिन कस्बों के बाशिंदे भी महंगाई से लूट गये हैं

गाँववाले भी सीख गए हैं अब हर वो तमाम इल्म
शहरों की तरह गांव में दिलों के  रिश्ते टूट गए हैं

बुधवार, 21 जुलाई 2021

जान-निसार

ये मिल्लत तुझे हम बेपनाह प्यार करते हैं 
नेकी के राह में हम जान निसार करते है 

किसी के आँखों में कभी न आ जाये नमी
जान का क़तरा क़तरा हम फुवार करते हैं 

तेरा दामन और आसियाना सलामत रहें 
धन दौलत को सदके से  बेज़ार करते  हैं

तुझ से जुदा हमारे जीस्त का वजूद कहाँ 
ये वतन तुझे हम अश्क बेशुमार करते हैं
 
कोई मासूम कोई मजलूम भूखा ना  रहें 
मालिक से यही  हर बार गुहार करते हैं 

संगदिली व तंगदिली से हमें निजात मिले 
आज दिल से इक ऐसा ही करार करते हैं 

ईद सबके घरों में यूँ ही मनाई जाती रहें  
चलो इसके लिए उपाय हज़ार करते हैं 

शनिवार, 17 जुलाई 2021

अल्फाज़

शायद मैं चन्द अल्फाज़ हूँ मेरा  कोई मकां नहीं
फैल जाता हूँ स्याही की तरह जिसकी इंतहां नहीं

कितने नायाब हरफ़ सजा रखें अपनी गुलशन में
कैसे बताऊं इसे अपने रूप का कोई गुमां नहीं

धीरे धीरे मेरा वजूद घुल जाता हैं इन्हीं फजाओं में
मेरे सिम्त की कोई सरहद नहीं कोई निशान नहीं

किसके जानिब अपनी अल्फ़ाज़ों का रूख करूँ
जिसकी मुक़्क़मल जमीन नहीं कोई आसमां नहीं 

मरासिम है हिंदवी से कभी रेख़्ता से कभी उर्दू से
इन चंद अशआर के सीवा मेरी कोई ज़ुबान नहीं 
  
भटकता हूँ कभी गंगा कभी सिंधु के वादिओं में 
बेपनाह तिश्नगी का अनवरत सफर आसान नहीं