रविवार, 7 नवंबर 2021

तो बात बने

दिया जलाकर हम तम को भगाये तो बात बने
दीपक में अपने अहम को जलाये तो बात बने

साल दर साल से हिन्द में पुरनूर है ईदे दीवाली
अबकी दफा दरद पे मरहम लगाए तो बात बने 

अपने अपने अहद में मसरूफ है अब हर कोई
इमरोज़ सीने के ज़म को पिघलाये तो बात बने

धुआँ धुआँ उड़ा था बन्दी में हौसलों के अरमान
इस कोरोना के हर सितम को हताये तो बात बने

देश दुनिया में अमन खुशी का फिर गूँजे तराना 
सबके के नयनों के नम को सुखाये  तो बात बने

अमन के परचम

अमन के परचम लहराते है हमारे लोग
तारीख़ गवाह है कभी यलगार नहीं करते

कुदरती सरमाये से लबरेज हमारी जमीं
इसलिए हम मौत का कारोबार नहीं करते

बेपनाह ख्वाहिशें न रखते हमवतन मेरे
बेवजह कन्धों को चार चार नहीं करते

जो आया समा गया इस हसीं दरिया में 
हम लुटेरों का भी तिरस्कार नहीं करते

सदियों से अपनी हदों में रहने वाले कौम
बेमतलब सरहदों का विस्तार नहीं करते



बुधवार, 13 अक्टूबर 2021

अनवरत सफर

पल में ही पल जीने का पहर है 
जीवन हरपल अनवरत सफर है

सर्द मौसम में पत्ते तो बिखरते है
बहार की ताक में खड़ा शज़र है

मकाम बदल गया मंजिल नहीं
आँखों मे जज्ब कल का डगर है

उस समंदर में कुछ है हलचल
प्रतिद्वंदी मित्र और वही समर है

होठों में है एक ही मन्त्र प्रतिक्षण
तीन रंगों में लिपता सा ज़िगर है


 

सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

आने दो

निग़ाहों में सुर्ख लपटें चिंगारी को आने दो 
वफ़ा भी करूंगा सनम खुमारी को आने दो 

यार कहते हैं कि मोहब्बत गज़ब की बला है 
मान लूंगा लेकिन इस बीमारी को आने दो 

पलकें बिछाए मैं बैठा रहा कल शब भर 
टूट भी जाएगा ऐतवार बेदारी को आने दो 

उम्मीद हैं आएंगे वो मेरे काशाने में एक दिन 
सब्र रखिये जरा मौसमें करारी को आने दो 

दीदार की आरजू में गुज़रे दिन महीने साल 
छोड़ दूंगा इंतज़ार इल्में शुमारी को आने दो

सोमवार, 13 सितंबर 2021

दास्ताने दिल्ली

दिलबर हम दिल है दिल्ली है हर दिलजान है
गुरबत में या शोहरत में यहीं मेरी पहचान है

अरावली के दामन में छुपा हुआ है कितने राज़
यमुना के अनवरत सफ़र में कैद मेरी जान है

सदियों से बिछती है सियासत की विसात यहीं
तुग़लक़ मुग़ल अंग्रेजों की भी यहीं श्मशान है

छुप न सका सूरत मेरी जुल्म और  सितम से
तंगहाली में भी मिट न सका मेरी निशान हैं

सीने में बदस्तूर बसते रहें कारवां दर कारवां 
जर्रे जरा में जज्ब यहीं मेरी इश्के ईमान है

शनिवार, 11 सितंबर 2021

हिज़्र के दिन

 तुझसे कभी कभी छुप के मिलने के चर्चे अब सरेआम हो गए हैं।
मिलते हैं हम तुम लेकिन कितनों के दिल कत्ले आम हो गए हैं।

अमीनाबाद के गलियों में गुजारे हुए वो दो चार बेशकीमती लम्हें
तेरे हिज़्र में वो चन्द  हसीन लम्हें अब सालों में तमाम हो गए है।

भटक रही है किस क़दर मेरी राहे सिम्त ऐशबाग वा चारबाग में
मंजिले आलम की बात क्या कहें अब वो भी मक़ाम हो गए हैं।

मिल से गयें है मुख्तलिफ हमारे सितारों का चलन इस कहकशां में
जुदाई में दिन अब तो सहर की तरह और शब भी शाम हो गए हैं

नहीं भाता आजकल गंज और चौक के वो लजीज़ आबोदाना
गोमती के वादियों के आब की तासीर भी नायाब ज़ाम हो गए है


गुरुवार, 2 सितंबर 2021

शहरे दिल्ली

मिरी तो कोई औकात नहीं है शहरे दिल्ली में 
ग़ालिब उन तंग कूचे से कोई निकलती तो है।
 
ख़ुसरो मीर दाग मोमिन हर कोई रूहजादा हुए 
उनके अल्फ़ाज़ों की सिसकियाँ निकलती तो हैं।

कुछ हमसाया हुए राह में कुछ वफ़ा न कर पाए
लेकिन उसके यादों की कशिश निकलती तो है। 

हज़ारों सालों में मिट न सकी मिरी फितरत यारों
नादिर के क़त्लेआम की ख़बर निकलती तो हैं।

बनता रहा है हमारा ये नशेमन टूटकर सात बार
चुनांचे हमारे माती से कुछ ख़ुशबू निकलती तो है।