शनिवार, 27 नवंबर 2021

दूरियां

मक़बूल होने की चाह में तुयूर हो गए है
ज़मीन से चंद लोग कितने दूर हो गए हैं

शायद पहले तो नहीं थी फ़ितरत उनकी
सरमाये के चलते अब मगरूर हो गए हैं

करते रहे गलियों में सिजदे सालों साल 
इंतखाब में जीतते नशे में चूर हो गए है 

कसमें खाते रहें अपने ईमान का उम्र भर 
मौका पे ज़मीर बेचकर मसहूर हो गए हैं

बेशुमार दिलों के धड़कन में थी जगह 
अब उन दिलों से मिटके बेनूर हो गए हैं

तिजारत

कितनों ने अपने को ढ़लते हुए देखा है।
वेबशी में सपनों को मरते हुए देखा है।

राहों से श्मशाने तलक तक के मंजर में
निगाहों के नमी को सूखते हुए देखा है

जीने की चाह में लूट रहा था सरमाया
आबोहवा का तिजारत होते हुए देखा है

बाजों व शाहीन को थी मौके की तलाश 
कुछ को आवाम को नोचते हुये देखा है

दवा दारू की खोज में गुजरते दिन रात
अव्वल मालदारों को बिकते हुए देखा है

खुदगर्जी के उस दौर में टूटा था इंसान
इंसानियत को तार तार होते हुए देखा है 

सुख ही गए थे कितने आँखों  से पानी 
मासूमों  की चिता सजते हुए देखा है 

दहशत के गिरफ्त में था देहात शहर  
कोरोना से घरों को बेजार हुए देखा है 

जीस्त

मेरे जीस्त की क्या पहचान है
धूल हवा आतेश आसमान है

उम्र का कारवां चलता है यूंही
जज़्ब जब तक इसमें जान हैं
 
जिस्म एक लिवास का नाम है 
इसके सिवा न कोई निशान हैं

ज़ाहिर है मुक्कमल अफसाना
जब तक रूह तब तक जान है

कितने ग़ाफ़िल है चन्दलोग यहां
जो नहीं है उसका उन्हें गुमान है

ग़ाफ़िलों जाहिलों की क्या कहें
आतेश में मिलने का अरमान है

रविवार, 7 नवंबर 2021

अश्क़ में

जबसे मेरा ख़ुद मुझसे जुदा हो गया है
ऐसा लगता है ये जिस्म खुदा हो गया है।

न साल की ख़बर इसे न सम्त की समझ
ऐसा लगता है ये दिल बेहूदा हो गया है।

करतें हैं चर्चे शब भर तन्हा विस्तर पर 
ऐसा लगता है ये शादी शुदा हो गया है।

इख़्तियार में न रहा जिस्म जान न वजूद 
ऐसा लगता है ये बेवशी मुद्दा हो गया है।

अश्क़ में डूब रहा है ये दिल की धड़कन
ऐसा लगता है ये अश्क़ ख़ुदा हो गया है।

तो बात बने

दिया जलाकर हम तम को भगाये तो बात बने
दीपक में अपने अहम को जलाये तो बात बने

साल दर साल से हिन्द में पुरनूर है ईदे दीवाली
अबकी दफा दरद पे मरहम लगाए तो बात बने 

अपने अपने अहद में मसरूफ है अब हर कोई
इमरोज़ सीने के ज़म को पिघलाये तो बात बने

धुआँ धुआँ उड़ा था बन्दी में हौसलों के अरमान
इस कोरोना के हर सितम को हताये तो बात बने

देश दुनिया में अमन खुशी का फिर गूँजे तराना 
सबके के नयनों के नम को सुखाये  तो बात बने

अमन के परचम

अमन के परचम लहराते है हमारे लोग
तारीख़ गवाह है कभी यलगार नहीं करते

कुदरती सरमाये से लबरेज हमारी जमीं
इसलिए हम मौत का कारोबार नहीं करते

बेपनाह ख्वाहिशें न रखते हमवतन मेरे
बेवजह कन्धों को चार चार नहीं करते

जो आया समा गया इस हसीं दरिया में 
हम लुटेरों का भी तिरस्कार नहीं करते

सदियों से अपनी हदों में रहने वाले कौम
बेमतलब सरहदों का विस्तार नहीं करते



बुधवार, 13 अक्टूबर 2021

अनवरत सफर

पल में ही पल जीने का पहर है 
जीवन हरपल अनवरत सफर है

सर्द मौसम में पत्ते तो बिखरते है
बहार की ताक में खड़ा शज़र है

मकाम बदल गया मंजिल नहीं
आँखों मे जज्ब कल का डगर है

उस समंदर में कुछ है हलचल
प्रतिद्वंदी मित्र और वही समर है

होठों में है एक ही मन्त्र प्रतिक्षण
तीन रंगों में लिपता सा ज़िगर है