जो हैं नहीं उसे देखने की हसरत नहीं
जागीर कभी था इसका गफ़लत नहीं
जागीर कभी था इसका गफ़लत नहीं
शबीह दिल में बसा कर रखा है दोस्त
चुनाँचे बार बार देखने की फुरसत नहीं
दरम्यां भले हजार कोस की बन गयी है
अब ये ना कहना कि मुझे उल्फ़त नहीं
रिश्तों के जंजीर की तासीर ऐसी होती
रोज रोज आजमाने की खसलत नहीं
होने का अहसास ही बहुत है सदीक
गौर देखिये ये दुनिया क्या जन्नत नहीं