सोमवार, 27 दिसंबर 2021

लम्हां लम्हां

एक दिन ये बेमियादी शब गुज़रे
आरजू है खुदा ये ब-सबब गुज़रे

ख्वाहिश नहीं सालों में बसर की
दो चार दिन सही बा अदब गुज़रे

सहर की चाह में मुन्तज़िर दिल
फुरसत के सानिया गज़ब गुज़रे

ख़ुशी में हो चाहे ग़म में परेशान
तेरी निगाहों में कुछ अजब गुज़रे

गुजिस्ता सालों से उम्दा गुजरें
इमसाल में अरबों खरब मिले 
 
अबकी दफा नए साल में दोस्त
लम्हां लम्हां फ़र्त-ए-तरब गुज़रे


शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

रिश्तें

जो हैं नहीं उसे देखने की हसरत नहीं
जागीर कभी था इसका गफ़लत नहीं

शबीह दिल में बसा कर रखा है दोस्त
चुनाँचे बार बार देखने की फुरसत नहीं

दरम्यां भले हजार कोस की बन गयी है
अब ये ना कहना कि मुझे उल्फ़त नहीं

रिश्तों के जंजीर की तासीर ऐसी होती 
रोज रोज आजमाने की खसलत नहीं
  
होने का अहसास ही बहुत है सदीक 
गौर देखिये ये दुनिया क्या जन्नत नहीं 

बुधवार, 22 दिसंबर 2021

इरादा

तंग राह में भी इरादा बढ़ने का रखते हैं
हौसला नायाब पुतला गढ़ने का रखते हैं

आंखों की जुबानी की कसम मेरे दोस्त
हुनर खामोशियों को पढ़ने का रखते है

दिल्ली के ईमारते मीनार क्या है हुज़ूर
जज्बा हिमालय पर चढ़ने का रखते हैं

रक़ाबत में ज़रा सा जर्रा न दूँ नज़राने में 
वफ़ा में जज्बा नीलम मढ़ने का रखते हैं

कदम रखता हूँ अपनी जमीन की हद में 
सोच चाँद सितारों का गढ़ने का रखते हैं 

शनिवार, 27 नवंबर 2021

दूरियां

मक़बूल होने की चाह में तुयूर हो गए है
ज़मीन से चंद लोग कितने दूर हो गए हैं

शायद पहले तो नहीं थी फ़ितरत उनकी
सरमाये के चलते अब मगरूर हो गए हैं

करते रहे गलियों में सिजदे सालों साल 
इंतखाब में जीतते नशे में चूर हो गए है 

कसमें खाते रहें अपने ईमान का उम्र भर 
मौका पे ज़मीर बेचकर मसहूर हो गए हैं

बेशुमार दिलों के धड़कन में थी जगह 
अब उन दिलों से मिटके बेनूर हो गए हैं

तिजारत

कितनों ने अपने को ढ़लते हुए देखा है।
वेबशी में सपनों को मरते हुए देखा है।

राहों से श्मशाने तलक तक के मंजर में
निगाहों के नमी को सूखते हुए देखा है

जीने की चाह में लूट रहा था सरमाया
आबोहवा का तिजारत होते हुए देखा है

बाजों व शाहीन को थी मौके की तलाश 
कुछ को आवाम को नोचते हुये देखा है

दवा दारू की खोज में गुजरते दिन रात
अव्वल मालदारों को बिकते हुए देखा है

खुदगर्जी के उस दौर में टूटा था इंसान
इंसानियत को तार तार होते हुए देखा है 

सुख ही गए थे कितने आँखों  से पानी 
मासूमों  की चिता सजते हुए देखा है 

दहशत के गिरफ्त में था देहात शहर  
कोरोना से घरों को बेजार हुए देखा है 

जीस्त

मेरे जीस्त की क्या पहचान है
धूल हवा आतेश आसमान है

उम्र का कारवां चलता है यूंही
जज़्ब जब तक इसमें जान हैं
 
जिस्म एक लिवास का नाम है 
इसके सिवा न कोई निशान हैं

ज़ाहिर है मुक्कमल अफसाना
जब तक रूह तब तक जान है

कितने ग़ाफ़िल है चन्दलोग यहां
जो नहीं है उसका उन्हें गुमान है

ग़ाफ़िलों जाहिलों की क्या कहें
आतेश में मिलने का अरमान है

रविवार, 7 नवंबर 2021

अश्क़ में

जबसे मेरा ख़ुद मुझसे जुदा हो गया है
ऐसा लगता है ये जिस्म खुदा हो गया है।

न साल की ख़बर इसे न सम्त की समझ
ऐसा लगता है ये दिल बेहूदा हो गया है।

करतें हैं चर्चे शब भर तन्हा विस्तर पर 
ऐसा लगता है ये शादी शुदा हो गया है।

इख़्तियार में न रहा जिस्म जान न वजूद 
ऐसा लगता है ये बेवशी मुद्दा हो गया है।

अश्क़ में डूब रहा है ये दिल की धड़कन
ऐसा लगता है ये अश्क़ ख़ुदा हो गया है।