ये जश्ने जम्हूरियत है ये ईदे जम्हूरियत है
अमृतकाल से गुजरता हमारी
तरबियत है
मिटा न सके तहजीब वो जुल्मों सितम से
सदियों में बनी हमारी ऐसी शख्शियत है
बसी है ये जमीं हर मजहब के लोगों से
जर्रे जर्रे में राम दिलों में रूहानियत है
सींचा हैं पुरखों ने जिसे अपने कतरों से
हिन्दे आईन हम सब की मिल्कियत है
करते शाद वतन तीन रंगों के कफ़न से
दिलों में तपिस आँखों में मासूमियत है
रुतबा तय नहीं होता अब दीन या लहू से
हमारे मुल्क़ में हर इंसा की अहमियत है
आबाद है मगरिब मशरिक मेरी नश्लों से
छाया हूँ दुनिया में मेरी ऐसी सलाहियत है
मिटा न सके तहजीब वो जुल्मों सितम से
सदियों में बनी हमारी ऐसी शख्शियत है
बसी है ये जमीं हर मजहब के लोगों से
जर्रे जर्रे में राम दिलों में रूहानियत है
सींचा हैं पुरखों ने जिसे अपने कतरों से
हिन्दे आईन हम सब की मिल्कियत है
करते शाद वतन तीन रंगों के कफ़न से
दिलों में तपिस आँखों में मासूमियत है
रुतबा तय नहीं होता अब दीन या लहू से
हमारे मुल्क़ में हर इंसा की अहमियत है
आबाद है मगरिब मशरिक मेरी नश्लों से
छाया हूँ दुनिया में मेरी ऐसी सलाहियत है