अनवरत गिरते पानी के बुलबुलों से पत्थर भी पिघलेंगे
वक़्त सा मिज़ाज रख संग तराशकर बहर भी निकलेंगे
सब्र से कदम धीरे बढ़ाये जा जब भी धूमिल दिखे रास्ता
इस मंजर या पसमंज़र से उम्मीद के डगर भी निकलेंगे
इस मंजर या पसमंज़र से उम्मीद के डगर भी निकलेंगे
सिंचो अपने ख्वाबों की जमीन को ख़ून और पसीनों से
सहरा में एक दिन बेहतर सब्ज ओ शज़र भी निकलेंगे
बगैर शोर किये साहिल की मानिंद बन जाओ मुंतज़िर
खामोश इस समंदर से सुनामी की लहर भी निकलेंगे
खामोश इस समंदर से सुनामी की लहर भी निकलेंगे
उम्मीद की लौ को जलाये रख इस घनघोर अंधियारे में
शबे गम से ख़ुशी की बेमिशाल एक सहर भी निकलेंगे