रविवार, 9 जून 2024

उम्मीद के डगर

अनवरत गिरते पानी के बुलबुलों से पत्थर भी पिघलेंगे  
वक़्त सा मिज़ाज रख संग तराशकर बहर भी निकलेंगे

सब्र से कदम धीरे बढ़ाये जा जब भी धूमिल दिखे रास्ता
इस मंजर या पसमंज़र से उम्मीद के डगर भी निकलेंगे  

सिंचो अपने ख्वाबों की जमीन को ख़ून और पसीनों से 
सहरा में एक दिन बेहतर सब्ज ओ शज़र भी निकलेंगे

बगैर शोर किये साहिल की मानिंद बन जाओ मुंतज़िर 
खामोश इस समंदर से सुनामी की लहर भी निकलेंगे 

उम्मीद की लौ को जलाये रख इस घनघोर अंधियारे में 
शबे गम से ख़ुशी की बेमिशाल एक सहर भी निकलेंगे

रविवार, 12 मई 2024

जारुल के फूल

तेरे अश्क़ में गुलाबी बैगनी होता जारुल के फूल
तेरे लबों से सुर्ख़ रंग चुराता ये गुलमोहर के फूल

बादे नसीम ने दस्तक़ दी वैसाख की एकसुबह में 
राहों में तेरा मिलना फिर से निराला एक कौतूहल

दोस्ती के रंग को तुमने ही पीला बनाया था शायद
जैसे इन हरी हरी पत्तियों के बीच इठलाता कनैल

तुम्हारी यादें अब भी झांकती है इन फ़ज़ाओं में 
जैसे तेरी जूलफों से रंग चुराता ये नशीले बादल

फिर से ज़र्द लिबास में लिपटे सोनाली के शज़र 
दमकता तेरा रुख़सार जैसे आफ़ताब का जमाल


बुधवार, 8 मई 2024

इंतिखाब

बिगूल बज चूका है  जश्न  है इंतिखाब का
तय अब हो गया है  मसला  इंतिसाब का

रोज नहीं आता है  मौका है बासवाब का  
राय तो बता दो वक़्त नहीं इज्तिनाब का 

कुछ तो हैं कमजर्फ इस चुनावी दौड़ में 
समझकर मत दें समय है इक्तिसाब का

चले हैं जीतने को वो कोरे वादों के सहारे 
नेकी के लिए चुने नायब ख्वाबख्वाब का 

न राजा न रंक हमसब हैं नायाब इंसान  
चुपके से जता दें बारी है इन्किलाब का

[बिगूल- Bugle इंतिखाब- Election, इंतिसाब- Fixing, बासवाब- Proper, 
इज्तिनाब-Abstain or avoiding, कमजर्फ-Silly
इक्तिसाब-Attainment/self gain, नायब- Repersentative, 
कोरे- Plain, ख्वाबख्वाब- Dream]

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

नगमा बन गए हो

उतरे हो जुबां में इस कदर कलमा बन गए हो
ठहरे हो सांसों में इस कदर नगमा बन गए हो

रगों में समाये दुआ हो मेरे मर्ज की हर दवा हो   
गुजरे हो नफ़्स में इस कदर नसमा बन गए हो
 
कुदरत का नेग हो कायनात का एक तारा हो 
सुनहरे हो ज़री की तरह सलमा बन गए हो 

सर्द रात की तपिश हो शबनमी एक शाम हो
गहरे हो ज़ख्म ये शबभर ज़लमा बन गए हो
 
गुलों से निकले रंग हो तिश्नगी का एक ढंग हो  
संवरे हो तुम इस कदर से  बलमा बन गए हो

सोमवार, 22 जनवरी 2024

जन जन में हूँ

आपके तन व जेहन में हूँ भारत के जन जन में हूँ
लाख कोशिश करो मेरे वजूद को न मिटा पाओगे

मिटाने वो चले थे मेरी वजूद अपनी तलवार से
वेदी पे सजी लाखों आहुतियां तुम कैसे बुझाओगे

पोत दिए वो मेरे परकोटे को गुम्बद व दीवार से
बुनियाद के सनातनी खम्भ को कैसे हिलाओगे 

फंसा रहा जुल्म में तो कभी सियासत के फंदो में 
न्याय की महफ़िल में राम को कैसे झुठलाओगे

लिखी जा रही है जरीकलम से फिर इबारत मेरी 
पांच सौ सालों के जख्मों पे मरहम तो लगाओगे

सोमवार, 24 जुलाई 2023

अमन का पयाम

अमन से सजाके एक पयाम लाया हूँ।
हिन्द से तेरे लिये एक सलाम लाया हूँ।

हर गुलशन में खिले रंग बिरंगे कलियाँ  
सरहदों पे यारी का एक पैगाम लाया हूँ 

बर्बाद होते हैं आशियाने हर यलगार में, 
खत्म हो रंजिशे ऐसा एक क़याम लाया हूँ 

आलमी कुनबा फ़लसफ़ा के हम वारिस 
फ़हमदारी का नया एक कलाम लाया हूँ 

हमारे नयनों में फिर से पुरनूर हो बहार 
शिहाब सुकूं से भरा एक मकाम लाया हूँ

रविवार, 16 जुलाई 2023

पिघलता दिल

देखकर तेरी शोख अदा दिल मचलने लगा है
तेरी आँखों के स्याही में दिल पिघलने लगा है

तेरी बोली के संगत में कोयल कुहूकने लगा है 
देखकर तुझे अब गुलों का रंग बदलने लगा है

तेरे आने की ख़बर सुन भंवरे बहकने लगा है
तेरे चन्दन सा बदन से फजाएँ महकने लगा है 

काली घटा की रंगत जुल्फों में निखरने लगा है 
ज़ुल्फों का तेवर ये देख सावन पसीजने लगा है

उमंग भरे दिल के परिन्दें अब चहकने लगा है
तेरे ईश्क में रोम रोम से तराने निकलने लगा है