रविवार, 25 जनवरी 2009

14 गीतिकाएँ



आजकल

आज तुम जो नहीं हो मेरी जिंदगी में,
कुछ भी नहीं है मेरे हर ख़ुशी में

राहें कलियाँ बिखेरती नहीं हैं फूलों में खुशबू नहीं है
अब बहारों  में उतना चमन नहीं रह गया है

मेरे जिंदगी में सावन नहीं है बस पतझर बन गयी है
काली घटाओं को हवा का झोंका उड़ा ले जाता है

अम्बर में तारे नहीं है झरना जमीं पर गिरती नहीं है
अब झील में कमल खिलकर मुस्कुराता  नहीं है

अपने पराये समझने लगे है दुनिया समझने लगी है

मुझे अब लोग गम का शहजादा समझने लगी है.
(वर्ष १९९१  में रचित) 
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आमना सामना 

वो जब मेरे सामने आती है 
मुझे दीवाना बनाकर चली जाती है 

ये  मौशम और फिजायें मुझे आशिक बना देता है 
उसकी जुल्फे मुझे घटा सावन की बनाकर जाती है 

उसकी अदाएं मुझे पवन बनाकर जाती है 
मेरे दिल में सुलगती हुयी आग छोड़ जाती है 

वो हँसकर आँखें मिलाकर आशिक बना देती है 
कभी वो रूठकर मुझको परवाना बना देती है 

सपनो में आकर मेरा नींद और चैन चुराती है 

कसम खिलाकर वो मुझे साजन बनाकर जाती है 
(वर्ष १९९१  में रचित) 
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अजब संयोग 

खुद जब देखे होंगे दुनिया को इतने करीब से
तभी तो लिखे होंगे तेरे मेरे नसीब को 

धरती  बनाये होंगे, अम्बर बनाये होंगे 
फूल बनाये होंगे, चमन सजाये  होंगे 
सुख दुःख के दीपक जलाएं होंगे अजीब से

झरनों की झड़ झड़ , सावन की पतझड़
कोयल की कूँ कूँ , बुलबुल  की गान
फूलों की घाटी सजाये होंगे अजीब से 

ये फूलों की कलियाँ, बहारों की रंगरेलियां 
ये हसीनो की गलियां, दीवानों की टोलियाँ
जमीं पर बसाये होंगे हमें अजीब से   

तुझे शमा बनाया, मुझे परवाना बनाया
तेरे मेरे प्यार की, एक अफ़साना बनाया 
तभी तो मिलन हुआ इतने अजीब से  
(वर्ष १९९१  में रचित) 
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कभी  न जा छोड़कर 

ओ नाजमी ये हसीन दिलरुबा कहाँ चली
मुझे इस गम में तड़पते छोड़कर

गांव की हर गलियों में फूलों  की हर वगीया में
दुनिया की रंगरेलियों में मिलकर न जा शरमा कर

नज़र मिलाकर मुझे घायल दीवाना बनाकर
कभी मुझसे दूर न जा जीवन में अकेला छोड़ कर

कभी थोड़ी हँसकर कभी थोड़ी गुनगुनाकर
बहारों की महफ़िल सजाकर न जा मुँह फेर कर

अपने दिल में बैठाकर पलकों में छुपाकर
अपना आशिक बनाकर न जा मुझसे यूँ रूठ कर
(वर्ष १९९१  में रचित) 
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सपने का सच 

सारा जहाँ मिल गया हर ख़ुशी मिल गयी
जब तुम मिल गए मेरे हमदम मेरे दिलवर

सपनो में जिसने मेरा नींद चुराती रही
दिन में जिसकी याद आते दीवाना होता रहा
लगता है मेरे सपनोँ की कामिनी मिल गयी

मैं वर्षो से जिन्हें राह में ढूंढता रहा
हर वादियों के कली से यह पूछता रहा
लगता है  वो हसीं हमसफ़र मिल गयी

मैं यादों में जिसके लिए गीत बनता रहा
राग में सजाकर उसे लव से गुनगुनाता रहा
लगता है मेरी वो मधुर रागिनी मिल गयी
वर्ष १९९१  में रचित) 
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 तुम्हारा प्यार

मुझे दुनिया में सिर्फ तुम्हारा प्यार चाहिए
जिंदगी के सफर में तुमसे हसीं यार चाहिए

तख़्त नहीं ताज नहीं, न कोई शान चाहिए
तेरे आँखों से छलकता प्यारा ज़ाम चाहिए

फूल नहीं खुशबू नहीं, न गुलशन की बहार चाहिए
हसीं तेरे नाजुक लवों से प्यार का इज़हार चाहिए

गीत नहीं संगीत नहीं न सुर सरगम चाहिए
तेरी कंगना की खनकती खनकार चाहिए

चाँद नहीं सितारा नहीं , न आकाशद्वीप चाहिए
तेरे दोनों नयनो में से निकलती नूरे बहार चाहिए
वर्ष १९९१  में रचित) 
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असमंजस

मुझे तुम अपने प्यार के काबिल नहीं समझी
संगदिल न मौत दे सकी नहीं जिंदगी दे सकी

वफ़ा तो तुमने निभाई नहीं बेवफाई भी न कर सकी
मधु तो तुमने पिलाई नहीं  ज़ाम भी पिला न सकी

अपना तो मुझे समझा नहीं बेगाना भी न समझ सकी
आशनाई तो की  नहीं दर्द- ए-दिल को भी न तोड़ सकी

रीत रश्में तो निभाई नहीं तुमने प्यार भी न कर सकी
दामिनी मुझपे गिराई तुमने अपने दामन न बचा सकी
(वर्ष १९९२ में रचित)
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प्यार का राही 

मैं प्यार का राही दीवाना चला,
दुनिया के हर अंजाम से अंजाना चला 

होंठों में मुस्कान लिए आखो में प्रेम का अरमान लिए 
बहारों के चमन से फूलों के उपवन तक गुजरता चला

रोज दिन अजीब से कुछ हसीनो के करीब से 
अपनी ख़ुशी भरी प्रेम गीत गुनगुनाता चला 

सागर के लहर से जिंदगी के सफर तक
ज़माने की खुशी में  गम को गले लगाता  चला 
(वर्ष १९९२ में रचित)
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कमसिन

सारी दुनिया के आशिकों की निगाह लग रही है  
तुम कमसिन लग रही हो , नमकीन लग रही  हो,

जब तुम मचलती हो तेरी कंगना खनक जाती है,
शायद संगीत की सुमधुर सरगम लग रही  हो 

तेरी बिंदियाँ चमक रही  है तेरा तन मन लहक रहा है,
तुम सचमुच अप्सरा  की सुन्दर प्रतिबिंब लग रही हो 

तुम चंचल लग रही  हो तेरी ओंठ कुछ कह रही है, 
तुम यक़ीनन मेरी  पढ़ी एक गजल लग रही हो 
(वर्ष १९९२ में रचित)
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बेइन्तहां प्यार

तन्हाई होती है बेताबी बढ़ती जाती है 
जब जब तुम मुझसे इतनी दूर होती है,

रात में तुम्हारी याद आती है मैं दीवाना होता हूँ 
सुबह सुबह तुम्हारे  घर के तरफ रवाना होता हूँ 

जग की रश्में छोड़ता हूँ सारे बंधन तोड़ता हूँ 
सच कह रहा हूँ तुझसे ही मैं प्रीत जोड़ता हूँ 

आसमान में बदली छाती है बरसात होती है 
तेरे बिना मेरा ये  तन मन सुलगता रहता है 

चांदनी  समझता हूँ तुझे ख्वाब समझता हूँ 
चाहकर भी तुझे  कभी  भूला नहीं पाता हूँ 

बेइन्तहां प्यार करता हूँ ये कसमें खाता हूँ 

साथ जीने और  मरने का तुमसे वादा करता हूँ

(वर्ष १९९२ में रचित)
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अंतिम मंजिल

तुम जन्नत के हूर के हमशक्ल हो 
शायद तुम किसी शायर की ग़ज़ल हो

तुम मेरी बाहों में रहोगी  तो समझूंगा 
तू मेरी खवाबो के अरमानो की नक़ल हो

जब तु मुझसे शरमा जाओगी तो समझूंगा 
तु ही मेरी वाटिका की नाजुक एक फूल हो

मेर गम को गले लगाओगी तो समझूंगा  
तुम ही मेरी जीवन की चंचल हमसफ़र हो

जीवन की राह में मिलोगी तो समझूंगा 

तु ही मेरी  चाहत की अंतिम मंजिल हो 
(वर्ष १९९२ में रचित)
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अारजू

ओ बेवफा तुझे मेरा दिल आज भी ढूंढता है 
तेरा ही नाम लेकर हरपल दिल आहें भरता है   

कल तुझे माँगा था और आज भी मांगता हूँ
ख़फ़ा क्या हुयी की वो सज़ा आज भी देती है 

तेरे लिये महफ़िल में पहले मैं गीत गाता था 
बेकरार  आज महफ़िल में फरियाद सुनाता है 

बीते लम्हों की प्यार भरी बातें याद करता हूँ 
तेरी तीरे नज़र का घायल सिसकता रहता है 

जहाँ भी रहें खुशहाल रहें मेरी यही अारजू है 
सिर्फ इकबार  में कह दे कि तु मेरा प्यार है   

(वर्ष १९९२ में रचित)
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मौसम मस्तानी

आहिस्ता दिन ढलने लगी सुहानी शाम हो गयी 
मेरे हुज़ूर तेरे आने से मौसम मस्तानी हो गयी 

कलियाँ खिलने लगा ये भँवरें चहकने लगा 
तेरा बदन चहकने लगा ये दिल बहकने लगा 

कोयल की कू कू  सुनकर चमन खिलने लगा 
जब लव गाने लगा तेरी पायल बजने लगी 

चंदा की आँख मिचौनी से धुप छाँव होने लगा
वदन पर रौशनी उलझने से मन मचलने लगा 

फिर रात हो गयी दुनिया नींद में नहाने लगी 
मेरे हसीन जानेमन तु बाहों में सिमटले लगी 
(वर्ष १९९२ में रचित)
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मिलन

ऐ पूछो न मुझसे उनसे कब हुई मुलाकातें
कैसे मिले थे हम कहाँ पर हुई क्या क्या बातें

मैं खुबसूरत वादियों में चल रहा था गुनगुनाते
मस्त समां में पसंद आ गई सनम की नज़ाकते

खवाबों की तस्वीर से रूबरू हुआ चलते चलते
यूँ ही हम एक रह पर चल पड़े मिलते मिलते

प्यार पर लग गई थी ज़माने के नज़रों के कांटे
सनम ने बचा लिया था भंवर में डूबते डूबते

सालों लग गए थे हमें ज़माने के फासले मिटाते
फ़िर पूछो न मुझसे कैसे गुजरी मिलन की रातें

वर्ष १९९२ में रचित

नज़र




नज़र

तुम्हे
देखा है जबसे मेरे दिल में ये करार आया है
शायद इसलिए मालिक ने तुझे मेरे लिए बनाया है

माथे पे सिन्दूरी सूरत तेरी काया कोमल कंचन है
नैन तेरे कजरारे हैं सनम झील के क्या कहने है

चले तुम चाल शराबी तेरी गाल गुलाब की पंखुरी है
जुल्फें घटा सावन की सनम बदल क्या कहने है

ओठों की रंग गुलाबी तेरी बातें शायर की ग़ज़ल है
माथे पे लाल बिंदियाँ सनम तारे के क्या कहने है

दिल में चपल चंचलता फूल सा तेरी नाजुक कमर है
चंदन सा तेरा बदन सनम खुश्बू के क्या कहने है

वर्ष १९९२ में रचित

राज़

जख्मों से भरी इस जिन्दगी में 
इश्क की दास्तान छुपी हैं 
चाँदनी इश्क के बारे में मत पूछ 
अभी सारी रात बाकी है 

मेरे मुस्कुराते अक्स के पीछे 
अश्कों की सैलाब छुपी है 
फिजाओं मुझे मदहोश न करना 
अभी सारी ज़ज्बात बाकी है 

उनके यादों के साये में 
जीन्दगी की तमन्नाएँ छुपी है 
घटाओं मेरे हाल पर तरस खाना
अभी बरसात बाकी है 

वफ़ा को बदनाम कर वो 
आज गैर की बाँहों में छुपी है 
मैय्यत पर कल सेहरा सजाना 
अभी अरमानो की बारात बाकी है 

उसके हाथों के सुर्ख हीना में 
मेरे कतरों की आह छुपी है 
निकाह की रात मुबारक 
अभी क़यामत की मुलाकात बाकी है
वर्ष १९९४ में लिखित

एक प्यास

एक प्यास
अपनों के इस भीड़ में भी 
हरपल ख़ुद को तन्हा पाता हूँ
रहकर समंदर की गोद में 
आज ख़ुद को प्यासा पाता हूँ 

नूर भरी बहार में भी 
दिले गुल को आज बेजार पाता हूँ 
रफीकों से भरे इस शहर में 
ख़ुद को बेसहारा पाता हूँ 

कतरों के सैलाब में भी 
अपनी नफ़स को थका पाता हूँ 
बुलंदियों की इस दौड़ में 
आज ख़ुद को खड़ा पाता हूँ 

सर्द बाद -ऐ-नसीम में भी 
इस दिल को जला पाता हूँ
गुलेरंग में भरी महफ़िल में भी 
बदन को बेरंग पाता हूँ 

रिश्तों की इस मयखाने में भी 
लवों को जला पाता हूँ 
नशेमन के बाज़ार में आज 
सर को बे-आसरा पाता हूँ 

रौशनी के इस तूफ़ान में भी 
आँखों को स्याह पाता हूँ 
नूर बरसाते सितारों में 
शिहाव को आज बेनूर पाता हूँ
मार्च २००७ में रचित

मुस्तकविल

मुस्तकविल

तेरी शोख नज़रों में 
मेरे मुस्तकविल का नूर है
एक साथ है सफ़र में 
फ़िर भी ये मंजिल दूर है 

तेरी सुर्ख लवों में
मेरी अव्वल ग़ज़ल माअमूर है 
रूह रूबरू है ज़ुहर में 
फ़िर भी ये महफ़िल बेनूर है 

तेरे पाक दामन में 
मेरा एक साहिल जरूर है 
एक सैलाब है ज़िगर में 
फ़िर भी ये दिल मजबूर है 

तेरे नूरानी रुखसार में 
मेरे पल पल का तसब्बुर है 
शरारा है ज़मीर में फ़िर भी 
ये संगदिल मशहूर है 

तेरे नफ़स-नफ़स में 
मेरी अज़ल का सरूर है 
महताव है सहर में 
फ़िर भी ये शिहाब मसरूर है

सितम्बर २००६ में रचित

शनिवार, 24 जनवरी 2009

इंतजार




इंतजार

मेरी आशिकी की इल्तिजा है कोई ख्वाबों के आशियाने में आए
इंतजार के लम्हें जवां है कोई मेरे पलकों के सामियाने में आए

बादे  सहर ने आवाज़ दी है कोई सावन के महीने में आए
बहुत करार है नफ़्स में कोई हमराह दिल के सकिने में आए

अश्कों की जाम पेशेखिदमत है कोई नैनों के पैमाने में आए
बहुत सरुर है जिंदगी में कोई जान के इस मयखाने में आए

मुझे एक अक्श का इंतजार है कोई तक़दीर के आईने में आए
बहुत तन्हाई है चितवन में कोई पहलू के काशाने  में आए

दिल की ऐ महफ़िल सजी है कोई मेरे सांसो के तराने में आए
बहुत आग है इस जिगर में कोई शिहाब के अफसाने में आए

अक्टूबर २००६ में रचित

इस्तकवाल



इस्तकवाल

हसरतों की जद्दो-जहद में 
अब तक गुजरा है जिंदगी का पल-पल
शब के आगोश में था डगर 
अब नए सहर का इस्तकवाल करेंगे

सवालों के सरो-साये में 

अब तक ठहरा है जिंदगी का सिलसिला
धुप के पानाह में था रहवर 

अब नए सफ़र का इस्तकवाल करेंगे

फ़लक की दरो-दीवार में 

अब तक सँवरा है जिन्दगी का महल
सराब के साये में था नज़र 
अब नए मंजर का इस्तकवाल करेंगे

ज़माने की रश्मों रिवायत में 

अब तक बिखरी है ज़िन्दगी का ग़ज़ल
संगदिल के हाथों में था खंज़र 

अब नए एतवार का इस्तकवाल करेंगे

शराबों की बूँद-ओ -बूँद में

अब तक उभरा है जिंदगी का कातिल
साकी के प्यालों में था ज़हर

अब नए नूर का इस्तकवाल करेंगे

अगस्त २००६ में रचित