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आजकल
आज तुम जो नहीं हो मेरी जिंदगी में,
कुछ भी नहीं है मेरे हर ख़ुशी में
राहें कलियाँ बिखेरती नहीं हैं फूलों में खुशबू नहीं है
अब बहारों में उतना चमन नहीं रह गया है
मेरे जिंदगी में सावन नहीं है बस पतझर बन गयी है
काली घटाओं को हवा का झोंका उड़ा ले जाता है
अम्बर में तारे नहीं है झरना जमीं पर गिरती नहीं है
अब झील में कमल खिलकर मुस्कुराता नहीं है
अपने पराये समझने लगे है दुनिया समझने लगी है
मुझे अब लोग गम का शहजादा समझने लगी है.
(वर्ष १९९१ में रचित)
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आमना
सामना
वो जब मेरे सामने आती है
मुझे दीवाना बनाकर चली जाती है
ये मौशम और फिजायें मुझे आशिक बना देता है
उसकी जुल्फे मुझे घटा सावन की बनाकर जाती है
उसकी अदाएं मुझे पवन बनाकर जाती है
मेरे दिल में सुलगती हुयी आग छोड़ जाती है
वो हँसकर आँखें मिलाकर आशिक बना देती है
कभी वो रूठकर मुझको परवाना बना देती है
सपनो में आकर मेरा नींद और चैन चुराती है
कसम खिलाकर वो मुझे साजन बनाकर जाती है
(वर्ष १९९१ में रचित)
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अजब संयोग
खुद जब देखे होंगे दुनिया को इतने करीब से
तभी तो लिखे होंगे तेरे मेरे नसीब को
धरती बनाये होंगे, अम्बर बनाये होंगे
फूल बनाये होंगे, चमन सजाये होंगे
सुख दुःख के दीपक जलाएं होंगे अजीब से
झरनों की झड़ झड़ , सावन की पतझड़
कोयल की कूँ कूँ , बुलबुल की गान
फूलों की घाटी सजाये होंगे अजीब से
ये फूलों की कलियाँ, बहारों की रंगरेलियां
ये हसीनो की गलियां, दीवानों की टोलियाँ
जमीं पर बसाये होंगे हमें अजीब से
तुझे शमा बनाया, मुझे परवाना बनाया
तेरे मेरे प्यार की, एक अफ़साना बनाया
तभी तो मिलन हुआ इतने अजीब से
(वर्ष १९९१ में रचित)
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कभी
न जा छोड़कर
ओ नाजमी ये हसीन दिलरुबा कहाँ चली
मुझे इस गम में तड़पते छोड़कर
गांव की हर गलियों में फूलों की हर वगीया में
दुनिया की रंगरेलियों में मिलकर न जा शरमा कर
नज़र मिलाकर मुझे घायल दीवाना बनाकर
कभी मुझसे दूर न जा जीवन में अकेला छोड़ कर
कभी थोड़ी हँसकर कभी थोड़ी गुनगुनाकर
बहारों की महफ़िल सजाकर न जा मुँह फेर कर
अपने दिल में बैठाकर पलकों में छुपाकर
अपना आशिक बनाकर न जा मुझसे यूँ रूठ कर
(वर्ष १९९१ में रचित)
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सपने का
सच
सारा जहाँ मिल गया हर ख़ुशी मिल गयी
जब तुम मिल गए मेरे हमदम मेरे दिलवर
सपनो में जिसने मेरा नींद चुराती रही
दिन में जिसकी याद आते दीवाना होता रहा
लगता है मेरे सपनोँ की कामिनी मिल गयी
मैं वर्षो से जिन्हें राह में ढूंढता रहा
हर वादियों के कली से यह पूछता रहा
लगता है वो हसीं हमसफ़र मिल गयी
मैं यादों में जिसके लिए गीत बनता रहा
राग में सजाकर उसे लव से गुनगुनाता रहा
लगता है मेरी वो मधुर रागिनी मिल गयी
वर्ष १९९१ में रचित)
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तुम्हारा प्यार
मुझे दुनिया में सिर्फ तुम्हारा प्यार चाहिए
जिंदगी के सफर में तुमसे हसीं यार चाहिए
तख़्त नहीं ताज नहीं, न कोई शान चाहिए
तेरे आँखों से छलकता प्यारा ज़ाम चाहिए
फूल नहीं खुशबू नहीं, न गुलशन की बहार चाहिए
हसीं तेरे नाजुक लवों से प्यार का इज़हार चाहिए
गीत नहीं संगीत नहीं न सुर सरगम चाहिए
तेरी कंगना की खनकती खनकार चाहिए
चाँद नहीं सितारा नहीं , न आकाशद्वीप चाहिए
तेरे दोनों नयनो में से निकलती नूरे बहार चाहिए
वर्ष १९९१ में रचित)
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असमंजस
मुझे तुम अपने प्यार के काबिल नहीं समझी
संगदिल न मौत दे सकी नहीं जिंदगी दे सकी
वफ़ा तो तुमने निभाई नहीं बेवफाई भी न कर सकी
मधु तो तुमने पिलाई नहीं ज़ाम भी पिला न सकी
अपना तो मुझे समझा नहीं बेगाना भी न समझ सकी
आशनाई तो की नहीं दर्द- ए-दिल को भी न तोड़ सकी
रीत रश्में तो निभाई नहीं तुमने प्यार भी न कर सकी
दामिनी मुझपे गिराई तुमने अपने दामन न बचा सकी
(वर्ष १९९२ में रचित)
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प्यार का
राही
मैं प्यार का राही दीवाना चला,
दुनिया के हर अंजाम से अंजाना चला
होंठों में मुस्कान लिए आखो में प्रेम का अरमान लिए
बहारों के चमन से फूलों के उपवन तक गुजरता चला
रोज दिन अजीब से कुछ हसीनो के करीब से
अपनी ख़ुशी भरी प्रेम गीत गुनगुनाता चला
सागर के लहर से जिंदगी के सफर तक
ज़माने की खुशी में गम को गले लगाता चला
(वर्ष १९९२ में रचित)
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कमसिन
सारी दुनिया के आशिकों की निगाह लग रही है
तुम कमसिन लग रही हो , नमकीन लग रही हो,
जब तुम मचलती हो तेरी कंगना खनक जाती है,
शायद संगीत की सुमधुर सरगम लग रही हो
तेरी बिंदियाँ चमक रही है तेरा तन मन लहक रहा है,
तुम सचमुच अप्सरा की सुन्दर प्रतिबिंब लग रही हो
तुम चंचल लग रही हो तेरी ओंठ कुछ कह रही है,
तुम यक़ीनन मेरी पढ़ी एक गजल लग रही हो
(वर्ष १९९२ में रचित)
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बेइन्तहां
प्यार
तन्हाई होती है बेताबी बढ़ती जाती है
जब जब तुम मुझसे इतनी दूर होती है,
रात में तुम्हारी याद आती है मैं दीवाना होता हूँ
सुबह सुबह तुम्हारे घर के तरफ रवाना होता हूँ
जग की रश्में छोड़ता हूँ सारे बंधन तोड़ता हूँ
सच कह रहा हूँ तुझसे ही मैं प्रीत जोड़ता हूँ
आसमान में बदली छाती है बरसात होती है
तेरे बिना मेरा ये तन मन सुलगता रहता है
चांदनी समझता हूँ तुझे ख्वाब समझता हूँ
चाहकर भी तुझे कभी भूला नहीं पाता हूँ
बेइन्तहां प्यार करता हूँ ये कसमें खाता हूँ
साथ जीने और मरने का तुमसे वादा करता हूँ
(वर्ष १९९२ में रचित)
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अंतिम
मंजिल
तुम जन्नत के हूर के हमशक्ल हो
शायद तुम किसी शायर की ग़ज़ल हो
तुम मेरी बाहों में रहोगी तो समझूंगा
तू मेरी खवाबो के अरमानो की नक़ल हो
जब तु मुझसे शरमा जाओगी तो समझूंगा
तु ही मेरी वाटिका की नाजुक एक फूल हो
मेर गम को गले लगाओगी तो समझूंगा
तुम ही मेरी जीवन की चंचल हमसफ़र हो
जीवन की राह में मिलोगी तो समझूंगा
तु ही मेरी चाहत की अंतिम मंजिल हो
(वर्ष १९९२ में रचित)
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अारजू
ओ बेवफा तुझे मेरा दिल आज भी ढूंढता है
तेरा ही नाम लेकर हरपल दिल आहें भरता है
कल तुझे माँगा था और आज भी मांगता हूँ
ख़फ़ा क्या हुयी की वो सज़ा आज भी देती है
तेरे लिये महफ़िल में पहले मैं गीत गाता था
बेकरार आज महफ़िल में फरियाद सुनाता है
बीते लम्हों की प्यार भरी बातें याद करता हूँ
तेरी तीरे नज़र का घायल सिसकता रहता है
जहाँ भी रहें खुशहाल रहें मेरी यही अारजू है
सिर्फ इकबार में कह दे कि तु मेरा प्यार है
(वर्ष १९९२ में रचित)
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मौसम
मस्तानी
आहिस्ता दिन ढलने लगी सुहानी शाम हो गयी
मेरे हुज़ूर तेरे आने से मौसम मस्तानी
हो गयी
कलियाँ खिलने लगा ये भँवरें चहकने लगा
तेरा बदन चहकने लगा ये दिल बहकने लगा
कोयल की कू कू सुनकर चमन खिलने लगा
जब लव गाने लगा तेरी पायल बजने लगी
चंदा की आँख मिचौनी से धुप छाँव होने लगा
वदन पर रौशनी उलझने से मन मचलने लगा
फिर रात हो गयी दुनिया नींद में नहाने लगी
मेरे हसीन जानेमन तु बाहों में सिमटले लगी
(वर्ष १९९२ में रचित)
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मिलन
ऐ पूछो न मुझसे उनसे कब हुई मुलाकातें
कैसे मिले थे हम कहाँ पर हुई क्या क्या बातें
मैं खुबसूरत वादियों में चल रहा था गुनगुनाते
मस्त समां में पसंद आ गई सनम की नज़ाकते
खवाबों की तस्वीर से रूबरू हुआ चलते चलते
यूँ ही हम एक रह पर चल पड़े मिलते मिलते
प्यार पर लग गई थी ज़माने के नज़रों के कांटे
सनम ने बचा लिया था भंवर में डूबते डूबते
सालों लग गए थे हमें ज़माने के फासले मिटाते
फ़िर पूछो न मुझसे कैसे गुजरी मिलन की रातें
वर्ष १९९२ में रचित


