रविवार, 27 जुलाई 2014

मिल्लत व उख़ूवत

आलम-ऐ-इंसान के दरम्यां मिल्लत व उख़ूवत बनी रहेंI
आकबत की खबर रब जाने दुनिया-ऐ- हकीकत बनी रहेंI

ईमान का तकाज़ा है सबों की खुशुशी शक्शियत बनी रहेंI
दीन-ऐ-नाम चाहे हम जो भीं दें उनकी अहलियत बनी रहेंI

रंग खुशबू जमीं फलक से गुलज़ार ये कायनात बनी रहेंI

अर्शोफर्श में अख्लाख़े आईन हो उनकी करामात बनी रहेंI

सदियों से ऐ पैगाम सरेआम है इंसानी फितरत बनी रहेंI
मंजिल- ऐ- जानिब मुख्तलिफ है उनकी रहमत बनी रहें I

दिल शफ़ाफ़ हो आइने की तरफ कौमी ज़ज़्बात बनी रहेंI
अज़ल पुरनूर हो शिहाब का उनकी अज़ालियत बनी रहेंI



[दरम्यां- between, उख़ूवत- Brotherhood, खुशुशी-specific
आकबत- Ressurection, फितरत- Nature, तकाज़ा-Reminder
कायनात- Universe अर्शोफर्श- Heaven and earth
करामात-Magic, आईन-Code, अख़लाख-moral, शिहाब-Shooting star
मुख्तलिफ- Distinct, अहलियत- Worthiness, अज़ालियत- immortal]

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

सांवरिया

विरहों के अग्नि में लपटी है वर्षों से मेरी काया
दादुर ताल लगाए सांवरिया सावनी रस घोल दो

माघ की शीत वसन में सिमटी है तेरी माया
कोयल कुहुँ बोले  सांवरिया बसंती रंग  घोल दो

अंधियारी दिवा में बिलखती है तेरी किशलया
पपीहरा पीयूँ  पुकारे सांवरिया अधर पट खोल दो

मधुर मिलन की आस में तरसती है तेरी छाया
भँवरे गुं गुं पुकारती सांवरिया प्रेम गीत मोल दो

तीव्र सप्तक   लय में थिरकती है तेरी सौम्या

घुँघरू झनन बाजे  सांवरिया पंचम भाषा बोल दो

हमारी मोहब्बत


हमारी सोहबत का कारवां बढ़ेगा 

पलकों के गुलाबी होने तक

ऐ मोहब्बत परवान चढ़ेगी अपनी 

अलकों के सफ़ेद होने तक

 

अभी आगाज़-ऐ-रौशनी  है इस मशरिक में, 

मेरे हमदम ऐ हमनवा 

हमारी चाहतों का शरारा सयान होगा 

दामिनी के चमकने तक

 

अभी आगाज-ऐ- शमा  है इस अंजुमन में, 

मेरे हमसफ़र ऐ दिलनशीं

हमारी आहटों का पयाम बयान होगा 

क़दमों के खनकने तक

 

अभी आगाज़-ऐ-रबी फ़सल है इस साल में, 

मेरे  हमराह ऐ दिलकशीं

हमारी आदतों का सूरत जवान होगा 

गुलों के महकने तक

 

अभी आग़ाज़-ऐ- अज़ल है इस हयात  

में, मेरे हरदम ऐ महजबीं

हमारी राहतों का अपना जहान होगा 

सांसो के लरज़ने तक

 

[सोहबत-Company, परवान-Climax, अलक- Hair,  शरारा-Spark, दामिनी-Lightning

मशरिक-East,  पयाम- Message, शमा –Candle,  अंजुमन-Distinct gathering

रबी-Spring,  फ़सल-Season, अज़ल-Death,  हयात-Life]  

मेरे महबूब

मेरे महबूब में क्या बात है, कलाम में बताई नहीं जाती
सनम की जितनी तारीफ करूँ, लवों में समायी नहीं जाती

आफ़ताब में महताब में उनका ही सब  नूर-ऐ-जमाल है
उनमे कौन सा रंग है, रंगीन कमान में समायी नहीं जाती

शहर में सहरा में उनका ही सब  खाक-ऐ-महाल है
उनके कितने चेहरे हैं, दुनिया-ऐ-शबीह में उतारी नहीं जाती

लहर में बहर में उनका ही सब ग़ज़ल-ऐ-महफ़िल है
उनमे कितनी तरन्नुम है, मकामात में समायी नहीं जाती

ज़हरा में शज़रा में उनका ही सब  रूह-ऐ- कमाल है
उनमे कितनी अबीर है, कभी नफ़स में छुपाई नहीं जाती

मंजर में पसमंजर में उनका ही सब नज़र-ऐ-कामिल है
उनमे कितने इल्म है, कभी तफ्सील से सुनाई नहीं जाती

कलाम-Words, आफ़ताब- Sun, महताब- Moon, नूर-ऐ-जमाल- Beautiful light
रंगीन कमान- Rainbow, सहरा-Desert, शबीह-Portrait, बहर- River, तरन्नुम- Rythem
मकामात- Music scale, ज़हरा- Flower, शज़रा- Trees, कमाल-Perfection,
अबीर- Fragnance, मंजर-Perspective, पसमंजर- Background, कामिल-Perfection
इल्म-Knowledge तफ्सील-Detail

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

नव वर्ष


इस वर्ष की यह अंतिम शाम मनोरम
नूतन वर्ष की प्रभात की किरण प्रथम
अमावश्या से खिलते इस पूर्णिमा को
हम करते हैं सुस्वागतम सुस्वागतम

विगत वर्ष की कुछ अविस्मरनीय कदम
नववर्ष में निरंतर बजे ख़ुशी की सरगम
अवसाद से निकलते इस नव आशा का

हम करते है सुस्वागतम सुस्वागतम


रविवार, 25 जनवरी 2009

14 गीतिकाएँ



आजकल

आज तुम जो नहीं हो मेरी जिंदगी में,
कुछ भी नहीं है मेरे हर ख़ुशी में

राहें कलियाँ बिखेरती नहीं हैं फूलों में खुशबू नहीं है
अब बहारों  में उतना चमन नहीं रह गया है

मेरे जिंदगी में सावन नहीं है बस पतझर बन गयी है
काली घटाओं को हवा का झोंका उड़ा ले जाता है

अम्बर में तारे नहीं है झरना जमीं पर गिरती नहीं है
अब झील में कमल खिलकर मुस्कुराता  नहीं है

अपने पराये समझने लगे है दुनिया समझने लगी है

मुझे अब लोग गम का शहजादा समझने लगी है.
(वर्ष १९९१  में रचित) 
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आमना सामना 

वो जब मेरे सामने आती है 
मुझे दीवाना बनाकर चली जाती है 

ये  मौशम और फिजायें मुझे आशिक बना देता है 
उसकी जुल्फे मुझे घटा सावन की बनाकर जाती है 

उसकी अदाएं मुझे पवन बनाकर जाती है 
मेरे दिल में सुलगती हुयी आग छोड़ जाती है 

वो हँसकर आँखें मिलाकर आशिक बना देती है 
कभी वो रूठकर मुझको परवाना बना देती है 

सपनो में आकर मेरा नींद और चैन चुराती है 

कसम खिलाकर वो मुझे साजन बनाकर जाती है 
(वर्ष १९९१  में रचित) 
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अजब संयोग 

खुद जब देखे होंगे दुनिया को इतने करीब से
तभी तो लिखे होंगे तेरे मेरे नसीब को 

धरती  बनाये होंगे, अम्बर बनाये होंगे 
फूल बनाये होंगे, चमन सजाये  होंगे 
सुख दुःख के दीपक जलाएं होंगे अजीब से

झरनों की झड़ झड़ , सावन की पतझड़
कोयल की कूँ कूँ , बुलबुल  की गान
फूलों की घाटी सजाये होंगे अजीब से 

ये फूलों की कलियाँ, बहारों की रंगरेलियां 
ये हसीनो की गलियां, दीवानों की टोलियाँ
जमीं पर बसाये होंगे हमें अजीब से   

तुझे शमा बनाया, मुझे परवाना बनाया
तेरे मेरे प्यार की, एक अफ़साना बनाया 
तभी तो मिलन हुआ इतने अजीब से  
(वर्ष १९९१  में रचित) 
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कभी  न जा छोड़कर 

ओ नाजमी ये हसीन दिलरुबा कहाँ चली
मुझे इस गम में तड़पते छोड़कर

गांव की हर गलियों में फूलों  की हर वगीया में
दुनिया की रंगरेलियों में मिलकर न जा शरमा कर

नज़र मिलाकर मुझे घायल दीवाना बनाकर
कभी मुझसे दूर न जा जीवन में अकेला छोड़ कर

कभी थोड़ी हँसकर कभी थोड़ी गुनगुनाकर
बहारों की महफ़िल सजाकर न जा मुँह फेर कर

अपने दिल में बैठाकर पलकों में छुपाकर
अपना आशिक बनाकर न जा मुझसे यूँ रूठ कर
(वर्ष १९९१  में रचित) 
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सपने का सच 

सारा जहाँ मिल गया हर ख़ुशी मिल गयी
जब तुम मिल गए मेरे हमदम मेरे दिलवर

सपनो में जिसने मेरा नींद चुराती रही
दिन में जिसकी याद आते दीवाना होता रहा
लगता है मेरे सपनोँ की कामिनी मिल गयी

मैं वर्षो से जिन्हें राह में ढूंढता रहा
हर वादियों के कली से यह पूछता रहा
लगता है  वो हसीं हमसफ़र मिल गयी

मैं यादों में जिसके लिए गीत बनता रहा
राग में सजाकर उसे लव से गुनगुनाता रहा
लगता है मेरी वो मधुर रागिनी मिल गयी
वर्ष १९९१  में रचित) 
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 तुम्हारा प्यार

मुझे दुनिया में सिर्फ तुम्हारा प्यार चाहिए
जिंदगी के सफर में तुमसे हसीं यार चाहिए

तख़्त नहीं ताज नहीं, न कोई शान चाहिए
तेरे आँखों से छलकता प्यारा ज़ाम चाहिए

फूल नहीं खुशबू नहीं, न गुलशन की बहार चाहिए
हसीं तेरे नाजुक लवों से प्यार का इज़हार चाहिए

गीत नहीं संगीत नहीं न सुर सरगम चाहिए
तेरी कंगना की खनकती खनकार चाहिए

चाँद नहीं सितारा नहीं , न आकाशद्वीप चाहिए
तेरे दोनों नयनो में से निकलती नूरे बहार चाहिए
वर्ष १९९१  में रचित) 
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असमंजस

मुझे तुम अपने प्यार के काबिल नहीं समझी
संगदिल न मौत दे सकी नहीं जिंदगी दे सकी

वफ़ा तो तुमने निभाई नहीं बेवफाई भी न कर सकी
मधु तो तुमने पिलाई नहीं  ज़ाम भी पिला न सकी

अपना तो मुझे समझा नहीं बेगाना भी न समझ सकी
आशनाई तो की  नहीं दर्द- ए-दिल को भी न तोड़ सकी

रीत रश्में तो निभाई नहीं तुमने प्यार भी न कर सकी
दामिनी मुझपे गिराई तुमने अपने दामन न बचा सकी
(वर्ष १९९२ में रचित)
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प्यार का राही 

मैं प्यार का राही दीवाना चला,
दुनिया के हर अंजाम से अंजाना चला 

होंठों में मुस्कान लिए आखो में प्रेम का अरमान लिए 
बहारों के चमन से फूलों के उपवन तक गुजरता चला

रोज दिन अजीब से कुछ हसीनो के करीब से 
अपनी ख़ुशी भरी प्रेम गीत गुनगुनाता चला 

सागर के लहर से जिंदगी के सफर तक
ज़माने की खुशी में  गम को गले लगाता  चला 
(वर्ष १९९२ में रचित)
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कमसिन

सारी दुनिया के आशिकों की निगाह लग रही है  
तुम कमसिन लग रही हो , नमकीन लग रही  हो,

जब तुम मचलती हो तेरी कंगना खनक जाती है,
शायद संगीत की सुमधुर सरगम लग रही  हो 

तेरी बिंदियाँ चमक रही  है तेरा तन मन लहक रहा है,
तुम सचमुच अप्सरा  की सुन्दर प्रतिबिंब लग रही हो 

तुम चंचल लग रही  हो तेरी ओंठ कुछ कह रही है, 
तुम यक़ीनन मेरी  पढ़ी एक गजल लग रही हो 
(वर्ष १९९२ में रचित)
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बेइन्तहां प्यार

तन्हाई होती है बेताबी बढ़ती जाती है 
जब जब तुम मुझसे इतनी दूर होती है,

रात में तुम्हारी याद आती है मैं दीवाना होता हूँ 
सुबह सुबह तुम्हारे  घर के तरफ रवाना होता हूँ 

जग की रश्में छोड़ता हूँ सारे बंधन तोड़ता हूँ 
सच कह रहा हूँ तुझसे ही मैं प्रीत जोड़ता हूँ 

आसमान में बदली छाती है बरसात होती है 
तेरे बिना मेरा ये  तन मन सुलगता रहता है 

चांदनी  समझता हूँ तुझे ख्वाब समझता हूँ 
चाहकर भी तुझे  कभी  भूला नहीं पाता हूँ 

बेइन्तहां प्यार करता हूँ ये कसमें खाता हूँ 

साथ जीने और  मरने का तुमसे वादा करता हूँ

(वर्ष १९९२ में रचित)
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अंतिम मंजिल

तुम जन्नत के हूर के हमशक्ल हो 
शायद तुम किसी शायर की ग़ज़ल हो

तुम मेरी बाहों में रहोगी  तो समझूंगा 
तू मेरी खवाबो के अरमानो की नक़ल हो

जब तु मुझसे शरमा जाओगी तो समझूंगा 
तु ही मेरी वाटिका की नाजुक एक फूल हो

मेर गम को गले लगाओगी तो समझूंगा  
तुम ही मेरी जीवन की चंचल हमसफ़र हो

जीवन की राह में मिलोगी तो समझूंगा 

तु ही मेरी  चाहत की अंतिम मंजिल हो 
(वर्ष १९९२ में रचित)
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अारजू

ओ बेवफा तुझे मेरा दिल आज भी ढूंढता है 
तेरा ही नाम लेकर हरपल दिल आहें भरता है   

कल तुझे माँगा था और आज भी मांगता हूँ
ख़फ़ा क्या हुयी की वो सज़ा आज भी देती है 

तेरे लिये महफ़िल में पहले मैं गीत गाता था 
बेकरार  आज महफ़िल में फरियाद सुनाता है 

बीते लम्हों की प्यार भरी बातें याद करता हूँ 
तेरी तीरे नज़र का घायल सिसकता रहता है 

जहाँ भी रहें खुशहाल रहें मेरी यही अारजू है 
सिर्फ इकबार  में कह दे कि तु मेरा प्यार है   

(वर्ष १९९२ में रचित)
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मौसम मस्तानी

आहिस्ता दिन ढलने लगी सुहानी शाम हो गयी 
मेरे हुज़ूर तेरे आने से मौसम मस्तानी हो गयी 

कलियाँ खिलने लगा ये भँवरें चहकने लगा 
तेरा बदन चहकने लगा ये दिल बहकने लगा 

कोयल की कू कू  सुनकर चमन खिलने लगा 
जब लव गाने लगा तेरी पायल बजने लगी 

चंदा की आँख मिचौनी से धुप छाँव होने लगा
वदन पर रौशनी उलझने से मन मचलने लगा 

फिर रात हो गयी दुनिया नींद में नहाने लगी 
मेरे हसीन जानेमन तु बाहों में सिमटले लगी 
(वर्ष १९९२ में रचित)
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मिलन

ऐ पूछो न मुझसे उनसे कब हुई मुलाकातें
कैसे मिले थे हम कहाँ पर हुई क्या क्या बातें

मैं खुबसूरत वादियों में चल रहा था गुनगुनाते
मस्त समां में पसंद आ गई सनम की नज़ाकते

खवाबों की तस्वीर से रूबरू हुआ चलते चलते
यूँ ही हम एक रह पर चल पड़े मिलते मिलते

प्यार पर लग गई थी ज़माने के नज़रों के कांटे
सनम ने बचा लिया था भंवर में डूबते डूबते

सालों लग गए थे हमें ज़माने के फासले मिटाते
फ़िर पूछो न मुझसे कैसे गुजरी मिलन की रातें

वर्ष १९९२ में रचित

नज़र




नज़र

तुम्हे
देखा है जबसे मेरे दिल में ये करार आया है
शायद इसलिए मालिक ने तुझे मेरे लिए बनाया है

माथे पे सिन्दूरी सूरत तेरी काया कोमल कंचन है
नैन तेरे कजरारे हैं सनम झील के क्या कहने है

चले तुम चाल शराबी तेरी गाल गुलाब की पंखुरी है
जुल्फें घटा सावन की सनम बदल क्या कहने है

ओठों की रंग गुलाबी तेरी बातें शायर की ग़ज़ल है
माथे पे लाल बिंदियाँ सनम तारे के क्या कहने है

दिल में चपल चंचलता फूल सा तेरी नाजुक कमर है
चंदन सा तेरा बदन सनम खुश्बू के क्या कहने है

वर्ष १९९२ में रचित