सफेद समंदर में तैरता स्याह
छुईमुई कातिल पुतली,
पुरनूर बरसती है दिलों में
तेरे नयनों के खुल जाने सेI
आसमान की पेशानी को चूमती
हुई ये सुरमई बदली,
कौंधती है बिजली सांसों
में तेरे अलकों के लहराने से I
उफ़क़ में मिलती धरा नभ की ये चम्पई ओंठ रंगीली,
उफ़क़ में मिलती धरा नभ की ये चम्पई ओंठ रंगीली,
तार झंकृत होते हैं दिलों
की तेरे लवों के कंपकंपाने से I
शफ़ाफ़ साक़ी-ए-गुलफाम की मानिंद अलसाई छबीली,
मदहोशी छा जाती हैं फिजां में तेरे जुवां के अंगराने सेI
माघ में शबनमी बूंद में नहाई रात थरथराई सजीली,
चमन खुल जाती हैं तेरे रुख में हिलकोरे बन जाने से I
शफ़ाफ़ साक़ी-ए-गुलफाम की मानिंद अलसाई छबीली,
मदहोशी छा जाती हैं फिजां में तेरे जुवां के अंगराने सेI
माघ में शबनमी बूंद में नहाई रात थरथराई सजीली,
चमन खुल जाती हैं तेरे रुख में हिलकोरे बन जाने से I

