रविवार, 24 दिसंबर 2017

#वजूद

एक चिंगारी हूँ 
नहीं मिटेगी रंगे दमक मेरी
गर बुझ भी गया 
एक दिन सितारों में समा जाऊँगा।

वो अमरवेल हूँ 

नहीं मिटेगी वजूद मेरी
गर जल भी गया 
एक दिन शाख में लिपट जाऊँगा।

वो गुले गुलशन हूँ 

नहीं मिटेगी खूशबू मेरी
गर टूट भी गया 
एक दिन गुल-ऐ-आब में महक जाऊंगा।

वो सूर साज़ हूँ 

नहीं मिटेगी खनक मेरी
गर बेताल भी हुए
 एक दिन झरनों में समा जाऊंगा।

एक कातिब हूँ 

नहीं मिटेगी हस्ती मेरी
गर मिट भी गया
एक दिन हिन्द-ए-दस्तावेज में रह जाऊँगा।

शनिवार, 14 जनवरी 2017

#मक़ाम

मैं वो शायर नहीं जो फूलों से रंग-ओ -बू चुराता हूँ

रुबाई तुम्हें मुबारक़ मैं मर्सिया से भी रंग जमाता हूँ


मैं वो मांझी नहीं जो मझधार में भंवरों से डराता हूँ

साहिल मिले न मिले मैं लहरों में भी सुर सजाता हूँ 

मैं वो बुझा शख्श नहीं जो ख़ारों से दामन बचाता हूँ

चमन मुबारक़ हो रफ़ीक़ मैं काँटों से भी निभाता हूँ


मैं वो सज़र नहीं जो सब्जे मंज़र को गले लगाता हूँ
नशेमन शाद हो तेरा मैं सहरा में भी ख़ुशी मनाता हूँ

मैं वो बंजारा नहीं जो  कारवां में कदम बढाता हूँ

मंजिल रब जाने मैं सहरा में भी मक़ाम बनाता हूँ

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

फ़ना

डूबा डूबा सा रहता हूँ 
पल पल तेरी  निग़ाहों में 
सिमट सिमट सा जाता हूँ 
पल पल तेरी पनाहों में


घुला घुला सा रहता हूँ 
हमदम तेरी आहों में

खोया खोया सा जाता हूँ 
हरदम तेरी बाँहों में


बिखरा बिखरा सा रहता हूँ
रहबर  तेरी राहों में

महक महक सा जाता हूँ
हम दम तेरी चाहों में

सहमा सहमा सा रहता हूँ
हमदम तेरी विरहों में
बँधा बँधा सा जाता हूँ 
हमसफ़र  तेरी गिरहों में 

संवरा संवरा सा रहता हूँ 
सनम तेरी शबीहों में
फ़ना फ़ना हो  जाता हूँ
दिलबर तेरी रूहों में 


गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

उम्मीद


चेहरे पर लकीर आ भी जाये  फ़ासिला कम हो
गुरब्बत के दिन चाहे आये दिलों में गिला कम हो 

सफर में है हम संग की तरह इस भरी दुनिया में 
इश्क असर हो गर शिकवों का दाखिला कम हो  

ज़लज़ला भी आये तो आने दो दिलों की बस्ती में  
रिस्ताए इमारत बनेगी गर बुनियाद हिला कम हो  

परवाना शमा की तरह जिए जाओ मदमस्ती  में 
अब रकीब हर नफरत का ये सिलसिला कम हो

सहरा में शजर की परवरिश के लिए हम वतन 
दोस्त गुजिश्ता रंजिशें जो हो अब सिला कम हो 

वक़्त की उम्र


वक़्त की उम्र कितनी कोई हमें हसाब बता दे
कल आज और कल के राज को अजाब बता दे

सफर में मौत कब होती ये कोई जवाब बता दे
पलों में फ़ना जिंदगी को  कोई बेहसाब बता दे

आने जाने की आँख मिचौनी को सबाब बता दे
जीने मरने  के खेल को कोई लाजबाव बता दे

सब्ज उगते रहेंगे कोई  रंगो का पड़ाव बता दे
महफ़िल और  कारवां का कोई ठहराब बता दे

लम्हों में सालों जीने की  कोई ख्वाब बता दे
क़तरा-समंदर में  भेद नहीं इसे शहाब बता दे  

बुधवार, 10 जून 2015

तरन्नुम

तरन्नुम ही जिंदगी की अव्वल शर्त होती है 
ये वो तार है जिसे टूटने पर मौत होती है

तर्रनुम का अहसास हैं सबों के सांसों में 
ये वो क़तरा है जो सबों के रग़ों में होती है

माकूल वक़्त इश्क की कभी शर्त नहीं 
ये वो जज़्बा है जो हरेक दिलों में होती है

रूयाँ में खुशफहमी का इलाज़ न शायद 
ये वो शब है जिसकी सहर नहीं होती है

साल से मरासिम का ख़्वाब नहीं 'शहाब'
मुख़्तसर हर पलों में दिल फ़ना होती है


बुधवार, 18 मार्च 2015

चैती बयार


पिया चैत के पुरवा बयार से चुन्दरिया लहर उठे
रामा कोयली के बोलियाँ से जिया में कसक उठे

डोली में लिए अमिया महुआ चैता कहार चहक उठे
फगुआ कहत कब बसंत में  चैती बयार दमक उठे

रूनी झुनि बाजे पायल  जब कमरिया लचक उठे
कमानी अखियों के प्रेमतीर से कलेजा धड़क उठे 

अमिया और महूलिया के खूश्बू से भोर महक उठे
जब गेहूँ काटे जाये सांवरिया मनवा में दहक उठे

सेजिया के  सलबट  में खोयी  देहिया झनक उठे 
परदेशिया बालम तेरे आने से  तन मन बहक उठे

सैयां  संग सेजिया में रात भर चूड़ियां  खनक उठे
बिजली करड़कने से रतियाँ में चोलिया मसक उठे