आपके तन व जेहन में हूँ भारत के जन जन में हूँ
लाख कोशिश करो मेरे वजूद को न मिटा पाओगे
मिटाने वो चले थे मेरी वजूद अपनी तलवार से
वेदी पे सजी लाखों आहुतियां तुम कैसे बुझाओगे
पोत दिए वो मेरे परकोटे को गुम्बद व दीवार से
बुनियाद के सनातनी खम्भ को कैसे हिलाओगे
फंसा रहा जुल्म में तो कभी सियासत के फंदो में
न्याय की महफ़िल में राम को कैसे झुठलाओगे
लिखी जा रही है जरीकलम से फिर इबारत मेरी
पांच सौ सालों के जख्मों पे मरहम तो लगाओगे