बेज़ारी के इस दौर में तन्हा तन्हा सब्र से गुजारें
लवों पे दुआ रख दोस्त इसका असर भी देखेंगे।
जुगनू की रौशनी में गुज़र जाएगी दो-चार लम्हें
स्याह शब के सीने से चीरता सा सहर भी देखेंगे।
टूट ही जातें हैं शाख़ों से पत्ते खिज़ा के दौर में
हिम्मत रखिये चमन में बहारे मंज़र भी देखेंगे।
जहां में मातम और खौफ में आज है इंसानियत
रफ्ता रफ्ता कातिल का थमता ज़हर भी देखेंगे।
जब ज़ज़्बात की कश्ती दाल दी हैं तूफान में
उम्मीद रख शहाब समंदर का लहर भी देखेंगे।
