सोमवार, 28 सितंबर 2020

हमारी आशनाई

आने से उनके ये जर्द सुबह नूरानी हो गयी है
उनसे मिलके सिंदूरी शाम सुहानी हो गयी है
 
जैसे ग़ज़लों में काफिया से आ आती है जान
लबों के खुलते ही फ़िज़ाएं तरानी हो गयी है
 
जैसे बहारों में खिलते हैं शज़र में सब्ज पत्ते
तुम्हारे आने से अब ये मंज़र धानी हो गयी है
 
जैसे जुदा हो जाते हैं शाखों से पत्ते खिजां में
तेरे जाने से अब दिन भी शबानी हो गयी है
 
जैसे परवाने जल जाते है शमा के आगोश में
हमारी आशनाई भी एक कहानी हो गयी है

बुधवार, 23 सितंबर 2020

यादें

गांव और देहात अब मेरे लिए एक नाम रह गया है
करवां का मकाम ढूंढना ही सिर्फ काम रह गया है

सफर तो शुरू किया था तुम्हारे बगल के चरपाई से
यादों के झरोखें में उस चारपाई का फाम रह गया है

वह छोटा सा कमरा दिल्ली के एक तंग मुह्हले की 
कभी कभी गुदगुदाती  वो मजलिसे शाम रह गया है
 
झरोखों से उन तंग गलियों में उसे बार बार झाँकना
वो निगाहें की शोखी वो अफ़साने आम रह गया है 

आँखों में उन सपनों का हर रोज बनता टूटता महल
यादों में हमारे दो चार घुट पीये हुए जाम रह गया है

तिरंगा की शान

ये अमन का कारवां यूँ ही जवान रखिये
हिन्द का नाम आलम में रौशन रखिये।

एशिया,रूस और यूरोप में यूं ही गुजरिए।
दिलों में नमी और होठों पे मुस्कान रखिये।

कायम करें सरहदों के पार भी ताल्लुकात  
जमीन पर कदम आसमानी अरमान रखिये।

फैलाये दोस्ती का पैगाम हर राहें फिजां में 
मशरिक से मगरिब तलक निशान रखिये ।

कुछ छोड़ दीजिये अपने कदमों के निशाँ 
हिन्द के फ़रिश्ते हैं तिरंगा की शान रखिये।

हिन्द के नुमाईन्दे

सरहदों के पार भी अपना  मुखतलिफ़ निशाँ होता है
हाथ खाली हो फिर भी वहां एक अपना ज़ुबाँ होता है

जीते -मरते है रोज दर रोज बगैर तमगों  की आस में
अफ्रीका,अमेरिका या जहां भी हमारा मकाँ होता है

हम हिन्दुस्तानियों के नुमाईन्दे हैं आलमी सतह पर
कौमी मुफाद के लिए हमारा हर लम्हा रवाँ होता है

तिरंगा के साये में बनता हमारा मजहब व तहज़ीब
ये जज़्बात महफ़िल में हमारे आँखों से बयाँ होता है

हिन्द हमारे रगों और लबों में हरदम हर मजलिस में
कातिब से सफ़ीर तलक का सफ़र यूँ जवाँ  होता है