बुधवार, 23 सितंबर 2020

यादें

गांव और देहात अब मेरे लिए एक नाम रह गया है
करवां का मकाम ढूंढना ही सिर्फ काम रह गया है

सफर तो शुरू किया था तुम्हारे बगल के चरपाई से
यादों के झरोखें में उस चारपाई का फाम रह गया है

वह छोटा सा कमरा दिल्ली के एक तंग मुह्हले की 
कभी कभी गुदगुदाती  वो मजलिसे शाम रह गया है
 
झरोखों से उन तंग गलियों में उसे बार बार झाँकना
वो निगाहें की शोखी वो अफ़साने आम रह गया है 

आँखों में उन सपनों का हर रोज बनता टूटता महल
यादों में हमारे दो चार घुट पीये हुए जाम रह गया है

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