सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

चुनावी मौसम

 दिन महीने साल अब फिर से गुजरने लगे हैं
अव्वाम अपने हाल को आम समझने लगे हैं।

मानसून के बाद दरख़्तों का रंग फिर सब्ज़ हुए
कुकुरमुत्ते फ़िर से अपने वज़ूद तलाशने लगे हैं।

इंतखाब के एलान के बाद उन्हें वायदें याद हुए
नुमाईदें फिर से अपने इलाकों में घूमने लगे हैं।

बन बैठे थे वो मालिक फिर गुरूर काफूर हुए  
दर दर की ख़ाक छान  पसीने में तरने लगे हैं।

ना असूल ना हया रहा रूतबा इनके दीन हुए
वो गिरगिट की तरह फिर रंग बदलने लगे हैं।

मजलिस में जाना अब इनके मजहब इमां हुए 
परिंदे इस डाल से उस डाल पे उछलने लगे हैं 

न कोई मुल्ज़िम रहा मुजरिम भी आजाद हुए 
इस चुनावी जंग में जन अदालत सजने लगे हैं 

गंगा-कोशी के हम्माम में दागी भी बेदाग हुए 
ग़फ़लत में शहाब क्यों चुनाव यूँ ही होने लगे है

रविवार, 26 अक्टूबर 2025

सहर

स्याह शब के सीने में सहर दमकती तो है।
मशरिक़ में रोज आफताब निकलती तो हैं।

नरगिसें अपनी सूरत पे ना इतना इतराये
फ़कत सूखा ही सही मोगरा महकती तो है।

चल रहा है यूं ही बिखरते रिश्तों का कारवां
आंखें खामोश ही सही सांसें लरज़ती तो है

बहुत नमी है दोस्त रिश्तों के आवो हवा में 
सहाब भले बेशर्म हो निगाहें बरसती तो है

बन रहा आशियां जिसे उजाड़े सय्यादों ने 
गुलशन में फिर से बुलबुल चहकती तो है