बुधवार, 13 अक्टूबर 2021

अनवरत सफर

पल में ही पल जीने का पहर है 
जीवन हरपल अनवरत सफर है

सर्द मौसम में पत्ते तो बिखरते है
बहार की ताक में खड़ा शज़र है

मकाम बदल गया मंजिल नहीं
आँखों मे जज्ब कल का डगर है

उस समंदर में कुछ है हलचल
प्रतिद्वंदी मित्र और वही समर है

होठों में है एक ही मन्त्र प्रतिक्षण
तीन रंगों में लिपता सा ज़िगर है


 

सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

आने दो

निग़ाहों में सुर्ख लपटें चिंगारी को आने दो 
वफ़ा भी करूंगा सनम खुमारी को आने दो 

यार कहते हैं कि मोहब्बत गज़ब की बला है 
मान लूंगा लेकिन इस बीमारी को आने दो 

पलकें बिछाए मैं बैठा रहा कल शब भर 
टूट भी जाएगा ऐतवार बेदारी को आने दो 

उम्मीद हैं आएंगे वो मेरे काशाने में एक दिन 
सब्र रखिये जरा मौसमें करारी को आने दो 

दीदार की आरजू में गुज़रे दिन महीने साल 
छोड़ दूंगा इंतज़ार इल्में शुमारी को आने दो