रविवार, 12 मई 2024

जारुल के फूल

तेरे अश्क़ में गुलाबी बैगनी होता जारुल के फूल
तेरे लबों से सुर्ख़ रंग चुराता ये गुलमोहर के फूल

बादे नसीम ने दस्तक़ दी वैसाख की एकसुबह में 
राहों में तेरा मिलना फिर से निराला एक कौतूहल

दोस्ती के रंग को तुमने ही पीला बनाया था शायद
जैसे इन हरी हरी पत्तियों के बीच इठलाता कनैल

तुम्हारी यादें अब भी झांकती है इन फ़ज़ाओं में 
जैसे तेरी जूलफों से रंग चुराता ये नशीले बादल

फिर से ज़र्द लिबास में लिपटे सोनाली के शज़र 
दमकता तेरा रुख़सार जैसे आफ़ताब का जमाल


बुधवार, 8 मई 2024

इंतिखाब

बिगूल बज चूका है  जश्न  है इंतिखाब का
तय अब हो गया है  मसला  इंतिसाब का

रोज नहीं आता है  मौका है बासवाब का  
राय तो बता दो वक़्त नहीं इज्तिनाब का 

कुछ तो हैं कमजर्फ इस चुनावी दौड़ में 
समझकर मत दें समय है इक्तिसाब का

चले हैं जीतने को वो कोरे वादों के सहारे 
नेकी के लिए चुने नायब ख्वाबख्वाब का 

न राजा न रंक हमसब हैं नायाब इंसान  
चुपके से जता दें बारी है इन्किलाब का

[बिगूल- Bugle इंतिखाब- Election, इंतिसाब- Fixing, बासवाब- Proper, 
इज्तिनाब-Abstain or avoiding, कमजर्फ-Silly
इक्तिसाब-Attainment/self gain, नायब- Repersentative, 
कोरे- Plain, ख्वाबख्वाब- Dream]