सोमवार, 17 जून 2024

रहगुज़र

कभी देश में  कभी परदेश में रहगुज़र रहता है 
बंजारा हयात है चुनांचे कदम सफ़ऱ में रहता है 

वतन का परचम हो बुलंद दुनिया-ऐ-महफ़िल में 
चलें चाहे जिन राहों पे मंजिल पर नज़र रहता है
 
गैर मुल्क की गलियों में भी मोहब्बत ढूंढ लेते है 
सिफारतगिरी के राहों में दिल-ऐ-ज़िगर रहता है 

बढ़ता रहता है कारवां अपने कौमी हदों से दूर 
कौमीमफ़ाद के लिए ऐ अगर-मगर में रहता है 

मकसद नहीं सिर्फ जीत की अमन की चाह में  
मुंतज़र शिहाब कभी इधर कभी उधर रहता है

रविवार, 9 जून 2024

उम्मीद के डगर

अनवरत गिरते पानी के बुलबुलों से पत्थर भी पिघलेंगे  
वक़्त सा मिज़ाज रख संग तराशकर बहर भी निकलेंगे

सब्र से कदम धीरे बढ़ाये जा जब भी धूमिल दिखे रास्ता
इस मंजर या पसमंज़र से उम्मीद के डगर भी निकलेंगे  

सिंचो अपने ख्वाबों की जमीन को ख़ून और पसीनों से 
सहरा में एक दिन बेहतर सब्ज ओ शज़र भी निकलेंगे

बगैर शोर किये साहिल की मानिंद बन जाओ मुंतज़िर 
खामोश इस समंदर से सुनामी की लहर भी निकलेंगे 

उम्मीद की लौ को जलाये रख इस घनघोर अंधियारे में 
शबे गम से ख़ुशी की बेमिशाल एक सहर भी निकलेंगे