सोमवार, 17 जून 2024

रहगुज़र

कभी देश में  कभी परदेश में रहगुज़र रहता है 
बंजारा हयात है चुनांचे कदम सफ़ऱ में रहता है 

वतन का परचम हो बुलंद दुनिया-ऐ-महफ़िल में 
चलें चाहे जिन राहों पे मंजिल पर नज़र रहता है
 
गैर मुल्क की गलियों में भी मोहब्बत ढूंढ लेते है 
सिफारतगिरी के राहों में दिल-ऐ-ज़िगर रहता है 

बढ़ता रहता है कारवां अपने कौमी हदों से दूर 
कौमीमफ़ाद के लिए ऐ अगर-मगर में रहता है 

मकसद नहीं सिर्फ जीत की अमन की चाह में  
मुंतज़र शिहाब कभी इधर कभी उधर रहता है

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