शनिवार, 15 मई 2021

ज़मीर के सौदागर

हिन्दे हयात अब सिर्फ इक घोंसला बनकर रह गया है,

हमवतनों का जान सिर्फ यहाँ हौसला बनकर रह गया है।


वुहानी के दौर में ज़मीर का सिलसिलेवार हो रहा सौदा,

इंसानियत के बिना जिस्म खोखला बनकर रह गया है।


दवा दारु व हवा की खोज में दर व दर भटकते क़दम,

हाँफती सांसों में जान उड़न खटोला बनकर रह गया है।


सियासतदां से भी बदतर अनेक बाज बैठे हैं ताक में,

हर नफ़्स इन शिकारियों का चोंचला बनकर रह गया है।


शिफाखाने से श्मशाने तलक हो रहा इंसानियत जार जार,

सिक्कों के चाह में चन्द शख्स दोगला बनकर रह गया है।


इन इज़ारेदारों के शोर में सहमी दबी मासूमों की जुबान

आम आदमी की आवाज अब तोतला बनकर रह गया है