कभी देश में कभी परदेश में रहगुज़र रहता है
बंजारा हयात है चुनांचे कदम सफ़ऱ में रहता है
बंजारा हयात है चुनांचे कदम सफ़ऱ में रहता है
वतन का परचम हो बुलंद दुनिया-ऐ-महफ़िल में
चलें चाहे जिन राहों पे मंजिल पर नज़र रहता है
गैर मुल्क की गलियों में भी मोहब्बत ढूंढ लेते है
सिफारतगिरी के राहों में दिल-ऐ-ज़िगर रहता है
बढ़ता रहता है कारवां अपने कौमी हदों से दूर
कौमीमफ़ाद के लिए ऐ अगर-मगर में रहता है
मकसद नहीं सिर्फ जीत की अमन की चाह में
मुंतज़र शिहाब कभी इधर कभी उधर रहता है