शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

नगमा बन गए हो

उतरे हो जुबां में इस कदर कलमा बन गए हो
ठहरे हो सांसों में इस कदर नगमा बन गए हो

रगों में समाये दुआ हो मेरे मर्ज की हर दवा हो   
गुजरे हो नफ़्स में इस कदर नसमा बन गए हो
 
कुदरत का नेग हो कायनात का एक तारा हो 
सुनहरे हो ज़री की तरह सलमा बन गए हो 

सर्द रात की तपिश हो शबनमी एक शाम हो
गहरे हो ज़ख्म ये शबभर ज़लमा बन गए हो
 
गुलों से निकले रंग हो तिश्नगी का एक ढंग हो  
संवरे हो तुम इस कदर से  बलमा बन गए हो

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