मंगलवार, 21 मार्च 2023

मोहब्बत का ज्वर

मैं तेरे मोहब्बत का ज्वर ही सही
निबाह लो भले इक क़हर ही सही
 
चढ़ न सका ये बला पहले शायद 
जिंदगानी का ढलता पहर ही सही

पी लीजिये अश्कों के दो चार जाम
कभी दवा समझकर ज़हर ही सही 
 
बनता हूँ बिखरता हूँ रेत पानी में
साहिल ढूंढता इक लहर ही सही

सहरा में आब तलाशती जर्द चश्म  
आब या सराब का असर ही सही

गुजर गए उलफ़त के नूरानी रातें 
'शिहाब' आग नहीं शरर ही सही 

[ज्वर- Fever, क़हर- calamity ,  साहिल - shore , 
जर्द चश्म- hawk 's  eyes , सराब -mirage , 
शिहाब-Flame , shooting  star ,  शरर- spark]