गुरुवार, 2 अगस्त 2018

वियना की बर्फीली रात

आज खिड़की से बरफ़ में लिपटी हुई दरख्तों को देखता हूँ,
सफेद लिवास में ख़ामोश जमीन के सब्ज को देखता हूँ।

इस दुधिया रात में सितारों के दीदार की ख्वाहिश लिए,
आज महताब को बेइंतहा फलक में खोजता हूँ।


सफ़ेद और स्याह की मानिंद है आज रंग क़ायनात का,
आज वाह रे कुदरत जमीन पर क़हक़शाँ को देखता हूँ ।


परिंदों का आशियाँ सलामत रहे बर्फीले शाख पर,
आज बर्फ के पिघलने में एक नज़्म सुनता हूँ।


ना कोई शोर हर तरफ है आज सन्नाटा का कारोबार,
स्तब्ध पलकों से दिल्ली की रौनक को वियना में ढूंढता हूँ

बसंत बहार

वो दिन थे कैसे जब पीली धूप का रहता था इंतज़ार
एक सिहरन सी होती थी तन में जब बहता था बयार


कहीं सरसों के पीले फूल कहीं मटर के बैगनी फ़ूल से

अलसी के नीली फूलों से बसंत का सजता था सिंगार

कहीं बेल की खूशबू और कहीं मिश्रीकंद के स्वाद से

भांग की हरियाली व महुआ से शोभित होता था बहार

कहीं सेमल के लाल फूल 
और कहीं खट्टे बेर के फलबागमती के किनारे किलकारी करता था किलकार


कहीं पूजा की तैयारियां कहीं अल्हड़ कोयल की तान
बसंत पंचमी में हर दिशा 
व मन में बजता था सितार