वो दिन थे कैसे जब पीली धूप का रहता था इंतज़ार
कहीं सरसों के पीले फूल कहीं मटर के बैगनी फ़ूल से
अलसी के नीली फूलों से बसंत का सजता था सिंगार
कहीं बेल की खूशबू और कहीं मिश्रीकंद के स्वाद से
भांग की हरियाली व महुआ से शोभित होता था बहार
कहीं सेमल के लाल फूल और कहीं खट्टे बेर के फलबागमती के किनारे किलकारी करता था किलकार
कहीं पूजा की तैयारियां कहीं अल्हड़ कोयल की तान
बसंत पंचमी में हर दिशा व मन में बजता था सितार
एक सिहरन सी होती थी तन में जब बहता था बयार
कहीं सरसों के पीले फूल कहीं मटर के बैगनी फ़ूल से
अलसी के नीली फूलों से बसंत का सजता था सिंगार
कहीं बेल की खूशबू और कहीं मिश्रीकंद के स्वाद से
भांग की हरियाली व महुआ से शोभित होता था बहार
कहीं सेमल के लाल फूल और कहीं खट्टे बेर के फलबागमती के किनारे किलकारी करता था किलकार
कहीं पूजा की तैयारियां कहीं अल्हड़ कोयल की तान
बसंत पंचमी में हर दिशा व मन में बजता था सितार
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