गुरुवार, 2 अगस्त 2018

बसंत बहार

वो दिन थे कैसे जब पीली धूप का रहता था इंतज़ार
एक सिहरन सी होती थी तन में जब बहता था बयार


कहीं सरसों के पीले फूल कहीं मटर के बैगनी फ़ूल से

अलसी के नीली फूलों से बसंत का सजता था सिंगार

कहीं बेल की खूशबू और कहीं मिश्रीकंद के स्वाद से

भांग की हरियाली व महुआ से शोभित होता था बहार

कहीं सेमल के लाल फूल 
और कहीं खट्टे बेर के फलबागमती के किनारे किलकारी करता था किलकार


कहीं पूजा की तैयारियां कहीं अल्हड़ कोयल की तान
बसंत पंचमी में हर दिशा 
व मन में बजता था सितार









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