मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

आँखे चार

एक बार आंखों से आंखे चार कीजिये।
बन जाऊंगा हमसफ़र एतवार कीजिये।

मिट ही जाएंगी फासलें हमारे रास्तों की 
एक दफा मेरी जानिब अबसार कीजिये।

रफ्ता रफ्ता क़दम बढ़ायें मकां की तरफ
होगी अपनी मंजिल एक इक़रार कीजिये।

तेरे रुखसार में कितने नूरानी गुल खिलेंगे
अपने जलवों से ये गुंचा गुलज़ार कीजिये।

बनते नहीं अव्वल झरोखें आशियाने में
बुनियाद बन ही रही है इंतज़ार कीजिए।

सोमवार, 27 दिसंबर 2021

लम्हां लम्हां

एक दिन ये बेमियादी शब गुज़रे
आरजू है खुदा ये ब-सबब गुज़रे

ख्वाहिश नहीं सालों में बसर की
दो चार दिन सही बा अदब गुज़रे

सहर की चाह में मुन्तज़िर दिल
फुरसत के सानिया गज़ब गुज़रे

ख़ुशी में हो चाहे ग़म में परेशान
तेरी निगाहों में कुछ अजब गुज़रे

गुजिस्ता सालों से उम्दा गुजरें
इमसाल में अरबों खरब मिले 
 
अबकी दफा नए साल में दोस्त
लम्हां लम्हां फ़र्त-ए-तरब गुज़रे


शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

रिश्तें

जो हैं नहीं उसे देखने की हसरत नहीं
जागीर कभी था इसका गफ़लत नहीं

शबीह दिल में बसा कर रखा है दोस्त
चुनाँचे बार बार देखने की फुरसत नहीं

दरम्यां भले हजार कोस की बन गयी है
अब ये ना कहना कि मुझे उल्फ़त नहीं

रिश्तों के जंजीर की तासीर ऐसी होती 
रोज रोज आजमाने की खसलत नहीं
  
होने का अहसास ही बहुत है सदीक 
गौर देखिये ये दुनिया क्या जन्नत नहीं 

बुधवार, 22 दिसंबर 2021

इरादा

तंग राह में भी इरादा बढ़ने का रखते हैं
हौसला नायाब पुतला गढ़ने का रखते हैं

आंखों की जुबानी की कसम मेरे दोस्त
हुनर खामोशियों को पढ़ने का रखते है

दिल्ली के ईमारते मीनार क्या है हुज़ूर
जज्बा हिमालय पर चढ़ने का रखते हैं

रक़ाबत में ज़रा सा जर्रा न दूँ नज़राने में 
वफ़ा में जज्बा नीलम मढ़ने का रखते हैं

कदम रखता हूँ अपनी जमीन की हद में 
सोच चाँद सितारों का गढ़ने का रखते हैं